नई भाषा के सामने पुराना हुनर: हीरा की प्रदर्शनी

प्रदर्शनी की मेज पर रखे कपड़े के बारे में प्रश्न पूछा गया तो हीरा ने बोलना शुरू किया, फिर रुक गई। प्रश्न अंग्रेजी में था और उत्तर देने के लिए उसे परिचित बात के नए शब्द नहीं मिल रहे थे। उसने दो शब्द कहे, मुस्कराई और सामने रखे कपड़े का किनारा सीधा करने लगी। साथ खड़े व्यक्ति ने जल्दी से कहा कि वह अच्छी तरह बता नहीं पाएगी, मैं समझा देता हूँ। हीरा ने उसकी ओर देखा। सुबह इसी काम की कई बारीकियाँ वह अपने साथियों को विस्तार से समझा रही थी।
बत्तीस वर्ष की हीरा बुनाई के काम से जुड़ी थी। अपने बनाए कपड़े, समय और मेहनत के बारे में उसे साफ जानकारी थी। शहर की इस प्रदर्शनी में वह पहली बार अकेले अपनी मेज सँभाल रही थी। आयोजकों ने उसे कुछ परिचय वाक्य याद करा दिए थे। शुरुआत तो उनसे हो जाती, मगर नया प्रश्न आते ही वह असहज हो जाती। उसे अंग्रेजी सीखने की जरूरत से कोई इनकार नहीं था। तकलीफ यह थी कि भाषा की इस कठिनाई को देखकर लोग उसके पूरे काम की समझ का अनुमान लगा रहे थे।
पास की मेज की समन्वयक नीलिमा ने पूछा कि क्या वह अपनी सहज भाषा में बात बताना चाहेगी। हीरा ने सिर हिलाया। इस बार उसने कपड़ा उठाकर क्रम से अपनी बात कही। नीलिमा ने बीच में स्वयं उत्तर जोड़ने के बजाय उसका अर्थ सुनकर सामने वाले तक पहुँचाया। जहाँ कोई शब्द निश्चित नहीं लगा, वहीं हीरा से फिर पूछा। बातचीत धीमी हुई, लेकिन हीरा उसमें बनी रही। उसके अनुभव को केवल तैयार बिक्री वाक्यों में नहीं बदला गया। आने वाले व्यक्ति ने अगला प्रश्न सीधे उसी से पूछा।
उस शाम हीरा ने कहा कि वह हर बार किसी और की मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहती। नीलिमा ने उसे यह कहकर शांत नहीं किया कि दूसरी भाषा की जरूरत ही नहीं है। दोनों ने देखा कि कौन से प्रश्न बार बार आ रहे हैं और उन्हें समझने के लिए किन छोटे शब्दों की जरूरत पड़ती है। हीरा ने अपने काम की मुख्य बातें पहले अपनी भाषा में साफ लिखीं। फिर उनके अर्थ समझते हुए दूसरे भाषा रूप पर अभ्यास किया। उसे केवल ध्वनि याद नहीं करनी थी। सामने वाला किस बारे में पूछ रहा है, यह पहचानना भी सीखना था।
अगले दिन उसने एक छोटा परिचय पत्र रखा। उसमें बहुत लंबे दावे नहीं थे। कुछ जरूरी जानकारी दो भाषाओं में थी और कुछ चीजें कपड़े के नमूने दिखाकर समझाई जा सकती थीं। पत्र उसकी जगह बोलने के लिए नहीं था। वह बातचीत शुरू करने में सहारा देता था। किसी प्रश्न का अर्थ न समझ आए तो हीरा दोहराने को कहती या सहायता लेती। इससे हर बात आसान नहीं हुई, मगर अपनी कठिनाई छिपाने के लिए चुप हो जाना अब एकमात्र रास्ता नहीं रहा था।
एक आगंतुक ने उसके उच्चारण पर हँसते हुए टिप्पणी की। हीरा का मन फिर पीछे हटने लगा। नीलिमा ने बात को उसकी योग्यता की परीक्षा बनने नहीं दिया और बातचीत को काम के प्रश्न पर वापस लाईं। बाद में हीरा ने कहा कि उसे उच्चारण भी बेहतर करना है। दोनों बातें साथ रह सकती थीं। सीखने की जरूरत स्वीकार करना अपमान स्वीकार करने की शर्त नहीं है। उसने उस दिन थोड़ी देर मेज अपने साथी को सौंपी और बाहर जाकर शांत हुई। अगली बातचीत में लौटना उसके लिए छोटा लेकिन जरूरी प्रयास था।
प्रदर्शनी समाप्त होने तक हीरा धाराप्रवाह नई भाषा नहीं बोलने लगी थी। ऐसा दावा करना स्वयं उसकी मेहनत को गलत समझना होता। वह कुछ प्रश्न बेहतर पहचान रही थी, अपने उत्तर का अर्थ जानती थी और सहायता माँगने में पहले से सहज थी। साथ ही आयोजकों को भी अपनी व्यवस्था में कमी दिखाई दी। केवल तैयार वाक्य दे देना नए व्यक्ति के लिए पर्याप्त सहयोग नहीं था। अगले कार्यक्रम में उन्होंने सरल परिचय, अनुवाद की मदद और अपने काम को दिखाकर समझाने की जगह पहले से तय की।
घर लौटकर हीरा ने भाषा सीखने का अभ्यास जारी रखा। उसने अपने काम की समझ को उस अभ्यास से अलग करके छोटा नहीं किया। दोनों उसके जीवन में अलग जरूरतें पूरी कर रहे थे और धीरे धीरे जुड़ सकते थे। शहर की मेज पर रुक गई पहली पंक्ति अब उसे केवल कमी की याद नहीं दिलाती थी। उसने दिखाया था कि किसी व्यक्ति की बात सुनने का तरीका भी उसकी प्रतिभा सामने आने में भूमिका निभाता है। नई भाषा सीखते समय सम्मान और अपनी आवाज की जगह सुरक्षित रहना भी उतना ही आवश्यक है।