ताली किसके हिस्से: सफलता में पूरी टीम को जगह दीजिए

पुरस्कार की मेज पर रखी चमकीली ढाल देखकर नेहा को अपने हाथों की हल्दी याद आई। सुबह इन्हीं हाथों से उसने दो सौ लोगों के भोजन की तैयारी की थी। अब आयोजन के संचालक उसकी छोटी भोजन सेवा का नाम पुकार रहे थे। वह मंच की ओर बढ़ी तो पीछे खड़ी कमला ने ताली बजाई। नेहा ने मुड़कर देखा। कमला की एड़ी पर पट्टी थी। वह पूरे दिन रसोई में खड़ी रही थी।
यह नगर की एक पुस्तक प्रदर्शनी का अंतिम दिन था। नेहा की टीम ने भोजन और चाय का काम सँभाला था। मेन्यू उसने बनाया था, ग्राहकों से बात भी उसी ने की थी। लेकिन सुबह गैस की एक भट्ठी बंद हुई तो कमला ने दूसरी व्यवस्था निकाली। डिब्बे कम पड़े तो रफीक ने पास के दुकानदार से खाली बर्तन माँगे। मीरा ने आने वाले लोगों की संख्या बदलते ही परोसने का क्रम बदला। किसी एक की सुंदर योजना अकेले इतना बड़ा काम नहीं कर सकती थी।
संचालक ने नेहा को सफल उद्यमी कहा। यह सुनना उसे अच्छा लगा। उसने इस काम में अपनी बचत लगाई थी और कई असफल दिनों का बोझ भी उठाया था। फिर भी धन्यवाद देते समय उसके मुँह से निकला कि उसने सब कुछ अपने दम पर किया है। वाक्य पूरा होते ही उसे असहजता हुई। सामने रोशनी तेज थी। पीछे खड़े साथी दिखाई नहीं दे रहे थे। उसने जल्दी से बात समाप्त की और नीचे उतर आई।
रसोई के अस्थायी कमरे में लौटकर उसने ढाल मेज पर रख दी। कमला बचे हुए चावल ढक रही थी। नेहा ने पूछा कि भाषण कैसा था। कमला मुस्कराई और बोली कि अच्छा था, अब हिसाब लिख लें तो सब घर जा सकेंगे। उसके स्वर में कोई शिकायत नहीं थी। लेकिन नेहा को अपना कहा वाक्य फिर सुनाई दिया। क्या शिकायत न होने से उसकी बात सही हो गई थी? उसने अपनी थकान के बीच दूसरों की थकान पहली बार ठीक से देखी।
उस रात घर जाकर उसने एक धन्यवाद संदेश लिखा। उसमें तीनों साथियों के नाम थे। संदेश भेजने से पहले उसने रफीक को फोन किया। उसने पूछा कि अगले दिन की तस्वीर में सबका नाम देना ठीक रहेगा या नहीं। रफीक ने कहा कि नाम से खुशी होगी, लेकिन पिछले अतिरिक्त काम का भुगतान भी जोड़ देना। नेहा एक क्षण चुप रही। उसे समझ आया कि सम्मान की तस्वीर सुंदर हो सकती है, मगर मेहनत का उचित हिसाब उससे अलग जिम्मेदारी है।
अगली सुबह टीम की बैठक हुई। नेहा ने मंच पर अपनी कही बात दोहराई और माना कि वह अधूरी थी। उसने किसी से तुरंत उसे क्षमा करने को नहीं कहा। फिर आयोजन का हिसाब खोला। अतिरिक्त घंटे, आने जाने का खर्च और कमला की बदली हुई जिम्मेदारी पर चर्चा हुई। हर बात पर सहमति आसानी से नहीं बनी। मीरा ने याद दिलाया कि अगली बार काम शुरू होने से पहले भूमिकाएँ तय होनी चाहिए। आखिरी दिन की उदारता पर पूरी व्यवस्था टिकी नहीं रह सकती।
नेहा ने आयोजकों को एक छोटी तस्वीर और संशोधित परिचय भेजा। उसमें उसकी भूमिका भी थी और टीम का काम भी। उसने अपने योगदान को मिटाया नहीं। उद्यम शुरू करना, जोखिम लेना और ग्राहकों का भरोसा जीतना उसकी मेहनत थी। लेकिन वह उपलब्धि दूसरे लोगों की दक्षता से बड़ी हुई थी। यह स्वीकार करने से उसकी पहचान घट नहीं रही थी। उलटे पहली बार उसे अपने काम की पूरी तस्वीर दिखाई दे रही थी।
अगले महीने एक नया समारोह मिला। इस बार तैयारी की सूची के ऊपर सबकी जिम्मेदारियाँ लिखी थीं। बीच में आराम का समय रखा गया और अंतिम हिसाब की तारीख भी तय हुई। पुरस्कार वाली ढाल रसोई की दीवार पर टाँग दी गई। उसके नीचे टीम की साधारण तस्वीर थी। कमला ने तस्वीर देखकर मजाक किया कि अगली बार चाय नेहा बनाएगी। सब हँस पड़े। उस हँसी में पहले से अधिक सहजता थी।
ताली किसे मिली, यह प्रश्न केवल मंच का नहीं था। वह इस बात से जुड़ा था कि सफलता की कहानी सुनाते समय कौन दिखाई देता है और कौन पीछे छूट जाता है। नेहा ने सीखा कि धन्यवाद को नाम, निर्णय और उचित व्यवहार में उतरना पड़ता है। मंच पर कुछ क्षण का प्रकाश मिल सकता है। काम की साझेदारी रोज की रोशनी माँगती है, जिसमें सब अपनी जगह साफ देख सकें।