डिजिटल यादों की सफाई: दादी की आवाज कहाँ रखी है

अंशुमान के फोन में जगह कम होने का संदेश कई दिनों से आ रहा था। वह हर बार उसे बंद कर देता। यात्रा की तस्वीरें, पुराने बिल, मजेदार वीडियो और काम की प्रतियाँ एक साथ जमा थीं। रविवार को उसने तय किया कि सब अनावश्यक चीजें हटा देगा। पहली सूची खुली तो एक ही सूर्यास्त की सत्ताईस तस्वीरें सामने आ गईं। उसे लगा कि यह काम बहुत जल्दी पूरा हो जाएगा।
कुछ मिनट बाद दादी की आवाज वाला छोटा वीडियो खुल गया। उसमें कोई विशेष कार्यक्रम नहीं था। दादी रसोई में बैठकर उसकी माँ से बात कर रही थीं और पीछे बर्तन की आवाज आ रही थी। अंशुमान उँगली रोककर सुनने लगा। वह वीडियो उसे याद भी नहीं था। बहुत सी चमकदार तस्वीरों के बीच एक साधारण रिकॉर्डिंग अचानक अधिक मूल्यवान लगने लगी।
दादी दूसरे शहर में रहती थीं। उसने उन्हें फोन किया और वह वीडियो सुनाया। दादी हँस पड़ीं। उन्होंने बताया कि उस दिन घर में पहली बार किसी नए व्यंजन की कोशिश हुई थी। वीडियो में जो वाक्य अधूरा सुनाई दे रहा था, उसका आगे का हिस्सा उन्होंने दोहराया। अंशुमान को लगा कि फ़ाइल में जो बचा है, वह पूरी स्मृति नहीं है। उसे समझने के लिए बातचीत और संदर्भ भी चाहिए।
उसने सफाई का काम रोककर माँ से पूछा कि परिवार की पुरानी तस्वीरें कहाँ हैं। माँ ने अलमारी से एक डिब्बा निकाला। कुछ तस्वीरों के पीछे तारीख और नाम लिखे थे, कुछ बिल्कुल खाली थीं। एक समूह चित्र में तीन चेहरों को कोई तुरंत पहचान नहीं पाया। माँ बोलीं कि दादी से पूछना होगा। यादों को सुरक्षित रखना केवल कागज या फ़ाइल बचा लेना नहीं, उनकी पहचान बचाना भी है।
अंशुमान ने फोन की सामग्री को धीरे धीरे अलग करना शुरू किया। काम के कागज एक तरफ, निजी तस्वीरें दूसरी तरफ और परिवार के लिए विशेष रिकॉर्डिंग अलग। हर चीज को उसी समय अंतिम निर्णय नहीं देना था। जिसे समझ नहीं पा रहा था, उसे बाद की जाँच के लिए रखता। जल्दी जगह खाली करने की इच्छा में वह ऐसी चीज नहीं हटाना चाहता था जिसकी उपयोगी प्रति कहीं और न हो।
एक यात्रा के सौ चित्रों में उसने कुछ चुने। वही घाट, वही पहाड़ और वही होटल बार बार दिखाई दे रहे थे। चुनी हुई तस्वीरों के साथ उसने दो पंक्तियाँ लिखीं कि वहाँ किसके साथ गया था और कौन सा छोटा प्रसंग याद रखने योग्य है। तस्वीरों की संख्या कम हुई, पर यात्रा की कहानी अधिक स्पष्ट होने लगी। अब उन्हें खोलने पर केवल तारीख नहीं, अनुभव भी सामने आता था।
माँ ने कहा कि कुछ तस्वीरें उनके निजी दायरे में ही रहें। अंशुमान ने उन्हें अलग रखा और साझा संग्रह में नहीं डाला। परिवार का होना हर व्यक्ति की पसंद एक कर देना नहीं था। किसी को अपनी पुरानी तस्वीर पसंद नहीं थी, किसी को कुछ संदेश अपने तक रखने थे। यादें मिलकर सँभालते समय भी अलग लोगों की इच्छा की जगह बनी रही।
दादी की रिकॉर्डिंग के लिए उसने एक नाम रखा जिसे बाद में पहचान सके। तारीख और प्रसंग लिख दिया। फिर सुरक्षित प्रति की व्यवस्था समझकर की और यह देखा कि वह वास्तव में खुल रही है। केवल कहीं भेज देना और मान लेना कि हमेशा मिल जाएगी, उसे पर्याप्त नहीं लगा। जिस चीज को विशेष कह रहा था, उसकी उपलब्धता की पुष्टि में थोड़ा समय देना भी स्वाभाविक था।
सफाई एक दिन में समाप्त नहीं हुई। पहले दिन केवल थोड़ी सामग्री देखी गई। अगले सप्ताह कुछ और। लेकिन अब यह दंड जैसा काम नहीं था। कभी कोई पुराना गीत मिल जाता और कभी किसी मित्र की पहली कोशिश का वीडियो। कुछ चीजें हँसाकर विदा हुईं और कुछ ने फिर बातचीत शुरू कर दी। हर फ़ाइल को रखना जरूरी नहीं था, हर फ़ाइल को बिना देखे हटाना भी नहीं।
कुछ दिनों बाद दादी ने एक पुरानी तस्वीर में खड़े अनजान व्यक्ति का नाम बताया। वह उनके विद्यालय के शिक्षक थे। अंशुमान ने नाम पीछे लिखने में माँ की मदद की और उसकी डिजिटल प्रति के साथ भी वही विवरण रखा। इस छोटी जानकारी से तस्वीर सजावट से आगे बढ़कर परिवार की कहानी का एक पहचाना हुआ हिस्सा बन गई।
फोन में अब कुछ जगह खाली थी, लेकिन अंशुमान को सबसे अधिक संतोष उससे नहीं हुआ। उसे लगा कि उसने संग्रह के साथ अपना संबंध बदला है। पहले सब कुछ जमा होता जाता था। अब वह चुनता, पहचानता और जरूरी चीज सुरक्षित रखता था। दादी की आवाज सुनते समय उसे किसी बड़ी तकनीक का प्रदर्शन नहीं दिखता था। उसे एक साधारण दिन का स्नेह सुनाई देता था, जिसे याद रखने के लिए ध्यान दिया गया था।