घर अपने आप नहीं चलता: कैलेंडर पर दिखाई दिए मीना के अनकहे काम

मौलिक काल्पनिक कथा
रविवार की सुबह मीना घर पर नहीं थीं। वे अपनी पुरानी सहेलियों के साथ पुस्तक मेले गई थीं। पति अरुण ने कहा था कि घर की चिंता मत करना। उन्हें लगा कि भोजन तैयार है, बाकी दिन सहज बीत जाएगा। दोपहर तक तीन छोटी बातें सामने आईं। पानी की रखी बोतलें खाली थीं, पिता की आवश्यक वस्तु कहाँ है किसी को मालूम नहीं था और शाम के मेहमानों का समय अलग-अलग समझा गया था।
मीना ने लौटकर सबकी परेशानी सुनी। किसी ने हँसते हुए कहा कि तुम्हारे बिना घर रुक जाता है। यह बात प्रशंसा जैसी लगी, लेकिन मीना को खुशी पूरी नहीं हुई। उन्होंने पूछा कि फिर उनके बाहर जाने को असाधारण घटना क्यों बनना चाहिए। यदि हर छोटी सूचना और काम उन्हीं से जुड़ा रहे, तो आराम के दिन भी उन्हें मन से काम पर रहना पड़ता है।
अरुण ने कहा कि जो कहतीं, कर देते। मीना ने उत्तर दिया कि बार-बार याद रखना और बताना भी काम है। परिवार कुछ देर चुप रहा। बात झाड़ू, भोजन या कपड़ों की सूची से आगे थी। कौन देखता है कि किस चीज की जरूरत होने वाली है? कौन समय याद रखता है? कौन एक काम के बाद दूसरे का ध्यान रखता है? ये जिम्मेदारियाँ दिखाई कम देती थीं।
बेटी मानसी ने कैलेंडर निकाला। उसने कहा कि एक सप्ताह केवल काम लिखते हैं, किसी को दोष देने के लिए नहीं। जो वास्तव में करता है, वही बताए। दादी ने अपनी जिम्मेदारियाँ लिखवाईं और यह भी कहा कि कुछ काम अब थकाते हैं। अरुण ने बाहर के काम रखे। मानसी ने पढ़ाई के साथ किए अपने छोटे काम जोड़े। मीना की सूची लंबी थी, पर परिवार ने इसे प्रतियोगिता नहीं बनाया।
पहले वे काम गिनकर बराबर बाँटना चाहते थे। फिर दादी ने पूछा कि पाँच मिनट का काम और रोज लंबी तैयारी एक जैसे कैसे हुए। किसी काम के समय के साथ उसके बोझ और व्यक्ति की उपलब्धता पर भी बात हुई। एक ही संख्या से न्याय तय नहीं हो रहा था। सबकी क्षमता और दूसरी जिम्मेदारियाँ अलग थीं। योजना को वास्तविक जीवन के साथ बनना था।
अरुण ने एक जिम्मेदारी पूरी तरह लेने की बात की। मीना ने पूछा कि क्या उसमें समय देखना, जरूरी सामान जाँचना और बदलाव बताना भी शामिल है। उन्होंने हाँ कहा। शुरू में कुछ चीजें छूटीं। मीना को खुद कर देने की जल्दी हुई, फिर दोनों ने जानकारी का सरल स्थान तय किया। मदद का अर्थ हर क्षण निर्देश का इंतजार करना नहीं रहना था।
मानसी ने भी काम चुना, लेकिन परीक्षा के सप्ताह में बदलाव की जरूरत रखी। मीना के लिए भी किसी दिन विश्राम का विकल्प उसी तरह मान्य हुआ। कैलेंडर कठोर आदेश नहीं था। यदि किसी की परिस्थिति बदले तो दूसरे से समय रहते बात करनी थी। यह मान लेना बंद हुआ कि घर में एक व्यक्ति हमेशा अतिरिक्त जगह निकाल ही लेगा।
कुछ सप्ताह बाद अरुण ने अपना काम करके कहा कि आज तो काफी समय लग गया। मीना ने मुस्कराकर सुना। उन्होंने हर पुराने दिन का हिसाब खोलकर जीतने की कोशिश नहीं की। नया अनुभव स्वयं बहुत कुछ बता रहा था। अरुण ने अगली बार अपनी योजना में वह समय रखा। समझ तब उपयोगी हुई जब अगले निर्णय में उसका असर आया।
दादी की पुरानी आदत थी कि मीना से ही हर सूचना पूछतीं। धीरे-धीरे उन्होंने कैलेंडर और जिम्मेदार व्यक्ति को देखना शुरू किया। मानसी भी कोई वस्तु न मिलने पर पूरे घर से पहले माँ को नहीं पुकारती। छोटे संबोधन बदले। मीना ने महसूस किया कि उनका ध्यान हर बातचीत में घर की केंद्रीय सूचना मशीन की तरह नहीं खींचा जा रहा। वे परिवार की सदस्य थीं, केवल व्यवस्था नहीं।
महीने के अंत में सबने कैलेंडर देखा। कुछ काम अच्छी तरह चले, कुछ का बँटवारा बदला। कोई व्यवस्था हमेशा के लिए पूर्ण नहीं बनी। मीना को बाहर जाने के लिए नया अपराधबोध नहीं देना था और अरुण के प्रयास को चूक के कारण रद्द भी नहीं करना था। जिम्मेदारी सीखने और निभाने के लिए संवाद बचा रहा।
अगली बार पुस्तक मेले का निमंत्रण आया तो मीना ने सहजता से तारीख लिख दी। घर में उनके काम का सम्मान केवल उनके बिना घबराने से नहीं, उनके साथ जिम्मेदारी बाँटने से दिखने लगा था। कैलेंडर ने प्रेम पैदा नहीं किया; उसने प्रेम के भीतर छिपा असमान बोझ दिखाया। परिवार के लिए यही महत्वपूर्ण था कि जो काम रोज होता है, वह अदृश्य होकर किसी एक व्यक्ति का भाग्य न बन जाए।
चित्र संबंधी सूचना: थंबनेल इस लेख के लिए बनाया गया कल्पनात्मक चित्रांकन है; इसे वास्तविक घटना का फोटोग्राफ या ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित चित्र न मानें।