शब्द सब आ गए, कहानी कहाँ गई? अनुवाद की मेज पर दो सहेलियाँ

मौलिक काल्पनिक कथा
मधुरा और सृष्टि को कक्षा की छोटी संस्कृत कहानी का सरल हिंदी रूप तैयार करना था। उद्देश्य छोटे बच्चों को वही कथा समझाना था। मधुरा ने हर शब्द के सामने हिंदी शब्द लिख दिया। सृष्टि ने पूरा अर्थ पढ़कर अपने ढंग से अनुच्छेद बना दिया। दोनों को अपना काम ठीक लगा। फिर उन्होंने एक-दूसरे की प्रति पढ़ी। पहली में वाक्य अटपटे थे, दूसरी में कुछ ऐसी बातें जुड़ गई थीं जो मूल कहानी में थीं ही नहीं।
मधुरा ने कहा कि उसने कुछ छोड़ा नहीं, इसलिए उसका रूप अधिक सही है। सृष्टि ने उत्तर दिया कि बच्चे ऐसे वाक्य कैसे समझेंगे। बहस में दोनों अपनी उपयोगी बात देख रही थीं, लेकिन दूसरे की कठिनाई नहीं। अध्यापिका ने उनकी प्रतियाँ अलग रखकर पूछा कि पाठक को मूल कथा का कौन-सा आशय मिलना चाहिए। प्रश्न ने मुकाबले से ध्यान काम की ओर मोड़ दिया।
दोनों ने पहले पात्र, स्थान और घटना का क्रम लिखा। फिर मूल पाठ में उनके आधार चिह्नित किए। सृष्टि ने देखा कि उसने एक पात्र की चिंता अपनी कल्पना से जोड़ दी थी। वह संभावना हो सकती थी, लेकिन कथा में कही नहीं गई थी। मधुरा ने देखा कि शब्दों का क्रम ज्यों का त्यों रखने से हिंदी में संबंध अस्पष्ट हो रहा था।
अध्यापिका ने कोई एक सार्वभौमिक सूत्र नहीं दिया। इस छोटे कार्य के लिए उन्होंने स्पष्टता और मूल आशय दोनों जाँचने को कहा। कठिन शब्द या रूप पर संदेह हो तो सहायता लेनी थी। बच्चों के लिए सरल भाषा चुनना और मूल में नई घटना जोड़ना अलग निर्णय थे। यदि वे स्वतंत्र रूपांतरण करना चाहें, तो उसका नाम और उद्देश्य अलग बताया जा सकता था।
मधुरा ने अपना पहला अनुच्छेद जोर से पढ़ा। सुनते समय उसे स्वयं अटकाव महसूस हुआ। उसने वाक्य बाँटे और संबंध साफ किए। फिर मूल पाठ से मिलाया कि कोई बात छूट तो नहीं गई। सृष्टि ने अपने जोड़े हुए संवाद हटाए। उन्हें लिखने में आनंद आया था, लेकिन इस काम में वे मूल के रूप में प्रस्तुत नहीं किए जा सकते थे।
दोनों ने एक दूसरी शीट रखी जिस पर स्वतंत्र कल्पना के सुझाव लिखे। इससे रचनात्मक विचार नष्ट नहीं हुए। बस उन्हें स्रोत का कथन बताकर नहीं रखा गया। बाद में चाहें तो अलग मौलिक कहानी बना सकती थीं। अभी उन्हें पहले से दी गई कथा के साथ ईमानदार रहना था। नाम बदल देने से मूल और अपनी कल्पना का अंतर अपने आप स्पष्ट नहीं होता।
अगले दिन उन्होंने छोटे भाई को हिंदी रूप सुनाया। उसने पूछा कि पात्र घर क्यों लौट रहा है। दोनों ने देखा कि संशोधन में उन्होंने एक आवश्यक संकेत छोटा करते हुए हटा दिया था। स्पष्ट भाषा बनाते समय अर्थ की कड़ी टूट गई थी। उन्होंने वह बात फिर जोड़ी। श्रोता का प्रश्न उनकी मेहनत की आलोचना नहीं, पाठ की एक वास्तविक कमी दिखा रहा था।
मधुरा को लगा कि काम बहुत धीमा हो गया है। एक छोटे अनुच्छेद पर इतना समय क्यों? फिर उसने पहला मसौदा पढ़ा। उसमें शब्दों की सूची थी, पाठक के लिए पूरी कथा नहीं। सृष्टि का पहला मसौदा सहज था, लेकिन मूल से आगे चला गया था। कई बार जल्दी तैयार दिखने वाला उत्तर बाद में अधिक सुधार माँगता है। दोनों की अलग सावधानियाँ अब एक-दूसरे की मदद कर रही थीं।
अंतिम प्रति पर उन्होंने लिखा कि यह कक्षा अभ्यास के लिए मूल पाठ का सरल हिंदी प्रस्तुतीकरण है। पाठ का नाम और पुस्तक का विवरण भी रखा। अध्यापिका ने जहाँ सुधार किया, वहाँ नोट बनाया। अपने छोटे अभ्यास को किसी विद्वान का प्रमाणित अनुवाद नहीं कहा। पाठक को काम की प्रकृति बताना भी उसकी स्पष्टता का हिस्सा था।
कुछ दिन बाद सृष्टि ने अपनी स्वतंत्र कहानी लिखी। उसमें नए संवाद और नया अंत था। इस बार उसने उसे मौलिक कल्पना कहा। मधुरा ने पढ़कर सुझाव दिए। पिछली चर्चा ने कल्पना का आनंद कम नहीं किया था। उसने केवल यह साफ किया कि कब वे किसी दूसरे पाठ का अर्थ पहुँचा रही हैं और कब स्वयं नई कथा बना रही हैं।
दो सहेलियों की मेज पर भाषा का काम केवल शब्द बदलना नहीं रहा। उन्हें पाठक, आशय और अपने निर्णयों के प्रति ध्यान रखना पड़ा। निष्ठा का अर्थ हमेशा एक ही क्रम रखना नहीं था, और सहजता का अर्थ कुछ भी जोड़ देना नहीं। वे अभी अभ्यास कर रही थीं, लेकिन अब अपने वाक्यों के साथ यह प्रश्न भी रख सकती थीं कि पाठक तक आखिर किसकी बात पहुँच रही है।
चित्र संबंधी सूचना: थंबनेल इस लेख के लिए बनाया गया कल्पनात्मक चित्रांकन है; इसे वास्तविक घटना का फोटोग्राफ या ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित चित्र न मानें।