पीला फीता और विजेता टोली: साथ दिखाई देना ही कारण होना नहीं

मौलिक काल्पनिक कथा
कबड्डी के मैदान से लौटते हुए आर्या ने अपने बालों का पीला फीता खोलकर जेब में रख लिया। उनकी टोली लगातार दूसरा मैच जीती थी। नंदिनी ने तुरंत कहा, “अगली बार यही फीता लगाना। इसके आने के बाद से हम जीत रहे हैं।” बात मजाक में शुरू हुई, लेकिन शाम तक टोली के कई बच्चों को उसमें सच्चाई लगने लगी। आर्या भी सोच रही थी कि पुराने नीले फीते की जगह पीला चुनना शायद अच्छा निर्णय था।
अगले अभ्यास में खेल शिक्षिका ने देखा कि बच्चे फीते की चर्चा अधिक और पिछले मैच की कम कर रहे हैं। उन्होंने हँसकर बात नहीं टाली। पूछा, “जीत के दिनों में और क्या नया हुआ था?” कुछ देर चुप्पी रही। फिर एक लड़के ने कहा कि उन्होंने पाला बदलने का अभ्यास ज्यादा किया था। नंदिनी को याद आया कि इस बार खिलाड़ियों की भूमिका भी पहले से साफ थी।
आर्या ने फिर भी कहा, “लेकिन फीता आने से पहले हम हारते थे।” शिक्षिका ने मेज पर अभ्यास की कॉपी रखी। पिछले महीने कुछ बच्चे नियमित नहीं आ पाते थे। नई बस व्यवस्था होने के बाद वे समय पर पहुँचने लगे थे। उसी सप्ताह टोली ने आपस में संकेत तय किए थे। फीता भी उसी समय बदला था, पर वह अकेला परिवर्तन नहीं था।
नंदिनी को लगा कि शिक्षिका उनका उत्साह कम कर रही हैं। उसने धीरे से पूछा, “तो अच्छी चीज को अच्छा भी न मानें?” शिक्षिका ने कहा कि पसंद का फीता लगाना बिल्कुल ठीक है। प्रश्न केवल यह है कि जीत का कारण तय करते समय हम किन बातों को देख रहे हैं। जो चीज साथ मौजूद थी, जरूरी नहीं कि परिणाम उसी से बना हो।
बच्चों ने अगला अभ्यास पुराने और नए फीते की परीक्षा नहीं बनाया। वे जानते थे कि खेल में अनेक बातें बदलती रहती हैं। उन्होंने केवल अपने खेल के हिस्सों पर ध्यान देने का निश्चय किया। किस मौके पर जल्दबाजी हुई, किसने सही समय पर साथी को संकेत दिया और कहाँ तालमेल बेहतर था, ये बातें लिखी गईं। पहली बार जीत के पीछे कुछ ठोस काम दिखाई देने लगे।
दो दिन बाद आर्या फीता घर भूल आई। मैदान पर पहुँचते ही उसका चेहरा उतर गया। नंदिनी के मन में भी एक क्षण के लिए शंका आई। फिर उसने अभ्यास की कॉपी खोल दी। दोनों ने तय संकेत दोहराए। शिक्षिका ने कोई आश्वासन नहीं दिया कि आज वे जरूर जीतेंगे। उन्होंने केवल कहा कि अपना खेल ध्यान से खेलो और जो होगा उससे सीखो।
उस दिन मैच बहुत निकट रहा और उनकी टोली हार गई। लौटते समय एक बच्चे ने कहा कि फीता होता तो ऐसा न होता। आर्या ने तुरंत उत्तर नहीं दिया। शाम को उसने कॉपी में आखिरी दो अंकों का विवरण देखा। एक मौके पर वे सीमा के पास असावधान हुए थे। दूसरे में सामने वाली टोली ने बेहतर तालमेल दिखाया था। हार का वास्तविक विवरण किसी वस्तु को दोष देने से अधिक उपयोगी था।
अगले सप्ताह पीला फीता फिर लगा, लेकिन मैच से पहले आर्या ने उसे भाग्य का प्रमाण नहीं कहा। वह उसकी पसंद था। उसने अभ्यास का समय देखा और साथी से भूमिका स्पष्ट की। उसे लगा कि किसी प्रिय चीज का आनंद लेने के लिए उसे परिणाम का अदृश्य संचालक बनाना आवश्यक नहीं। रंग की खुशी अपनी जगह रह सकती थी।
नंदिनी ने समूह की कॉपी के पहले पन्ने पर नया प्रश्न लिखा: “दो बातें साथ हुईं, पर क्या एक ने दूसरी को पैदा किया?” नीचे सभी ने उदाहरण दिए। बारिश के दिनों में स्कूल के पास छाते भी अधिक दिखते और रास्ता गीला भी होता। इसका अर्थ यह नहीं था कि छाते खोलने से रास्ता भीग गया। किसी तीसरी परिस्थिति को देखना पड़ सकता है।
आर्या ने अपना फीता उसी कॉपी के भीतर थोड़ी देर रखकर तस्वीर ली। तस्वीर सुंदर थी। इस बार उसके नीचे लिखा था, “हमारी पसंद और हमारा अभ्यास।” जीत की इच्छा अब भी थी, पर उसे समझने की दृष्टि बदल रही थी। कुछ प्रश्न हमारे उत्साह को छीनते नहीं; वे उसे ऐसी जगह टिकाते हैं जहाँ हम सचमुच कुछ कर सकते हैं।
चित्र संबंधी सूचना: थंबनेल इस लेख के लिए बनाया गया कल्पनात्मक चित्रांकन है; इसे वास्तविक घटना का फोटोग्राफ या ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित चित्र न मानें।