शांतिनिकेतन की प्रेरणा: कक्षा बदलने से पहले सीखने की दृष्टि कैसे बदले?

शांतिनिकेतन के सत्यापित इतिहास पर आधारित विचार; कक्षा का प्रसंग काल्पनिक है
नीलिमा बच्चों को विद्यालय के आँगन में ले आईं। सब प्रसन्न थे कि आज कमरे में नहीं बैठना पड़ेगा। लेकिन पाँच मिनट बाद वही पुरानी शिकायत शुरू हो गई: अब क्या लिखना है? अध्यापिका ने महसूस किया कि केवल जगह बदलने से सीखने का अनुभव अपने आप नहीं बदलता। यदि वही निर्देश और वही जल्दबाजी साथ रहे, तो पेड़ के नीचे भी कक्षा वैसी ही हो सकती है। उन्होंने उस दिन की तैयारी एक ओर रखी और बच्चों से सामने दिखाई देने वाली चीजों के प्रश्न बनाने को कहा।
इस काल्पनिक दृश्य की पृष्ठभूमि समझने में शांतिनिकेतन की शैक्षिक विरासत प्रेरणा दे सकती है। यूनेस्को के अनुसार रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने ग्रामीण पश्चिम बंगाल में 1901 में आवासीय विद्यालय और कला केंद्र स्थापित किया। 1921 में विश्वभारती की स्थापना हुई। इस परिसर की पहचान शिक्षा, प्रकृति, संगीत और कलाओं के संबंध तथा सांस्कृतिक सीमाओं से आगे मानव एकता की दृष्टि से जुड़ी है। खुली जगहों और पेड़ों के नीचे कक्षाओं की परंपरा भी इस विरासत का महत्वपूर्ण पक्ष है।
जगह का अर्थ उसके उपयोग में
किसी सुंदर शैक्षिक विचार की तस्वीर देखना आसान है। हम उसका बाहरी रूप अपना लें तो लगेगा कि वही अनुभव मिल जाएगा। लेकिन कक्षा का वास्तविक स्वरूप इस पर निर्भर है कि बच्चे क्या कर रहे हैं, प्रश्न की जगह कितनी है और शिक्षक उनकी प्रतिक्रिया कैसे सुनता है। अच्छी जगह अवसर देती है; उसे सीखने में बदलने के लिए योजना और संवेदना चाहिए।
नीलिमा ने बच्चों से एक पत्ता चुनने को कहा, उसे तोड़कर लाने को नहीं। वे वहीं देखते हुए उसका आकार वर्णित करेंगे। कुछ बच्चों ने तुरंत चित्र बनाया। एक ने पूछा कि पास के दो पेड़ों की छाया अलग क्यों है। दूसरे ने पत्ते में छोटे छेद देखे। अब बाहर आना केवल विश्राम नहीं रहा। आसपास की दुनिया अध्ययन का विषय बन रही थी। हर प्रश्न का उत्तर उस दिन देना आवश्यक नहीं था।
कला को हाशिये से हटाना
कभी चित्र, संगीत और अभिनय को पढ़ाई के बाद बचा समय भरने का साधन मान लिया जाता है। लेकिन वे देखने, सुनने और अभिव्यक्ति के अलग रास्ते खोल सकते हैं। एक बच्चा जो लंबे लिखित उत्तर में संकोच करे, चित्र के माध्यम से सूक्ष्म बात दिखा सकता है। इससे लिखना सीखने की जरूरत समाप्त नहीं होती। उसे अपनी बात तक पहुँचने का दूसरा मार्ग मिल सकता है।
नीलिमा ने अगली बार बच्चों को देखे हुए पत्ते पर चार पंक्तियाँ लिखने दीं। किसी ने कविता बनाई, किसी ने छोटा विवरण। फिर उन्होंने दोनों रूपों की जरूरत पर बात की। कौन-सा वाक्य अनुभव व्यक्त करता है और कौन-सा निरीक्षण बताता है? कला और जानकारी को मिलाने का अर्थ तथ्य तथा कल्पना का अंतर मिटाना नहीं। अलग अभिव्यक्तियों को समझना भी सीखने का काम है।
अपनी जड़ें और खुली दृष्टि
शांतिनिकेतन की विरासत स्थानीय तथा विविध सांस्कृतिक परंपराओं से संबंध का विचार भी सामने रखती है। अपनी भाषा और कलाओं का सम्मान करते हुए दूसरे संसारों से सीखना संभव है। दोनों को विरोधी बना देना शिक्षा को संकीर्ण कर सकता है। किसी नए रूप को समझने का अर्थ अपना परिचय खो देना नहीं, और अपनी परंपरा से प्रेम का अर्थ दूसरों की उपेक्षा भी नहीं।
विद्यालय के छोटे कार्यक्रम में यह बात सरल रूप में आई। बच्चों ने अपने घरों से प्रचलित लोरियों और कहावतों के उदाहरण जुटाए। हर सामग्री को बिना जाँच एक जैसी प्राचीन या प्रामाणिक नहीं कहा गया। उन्होंने पूछा कि यह किससे सुनी, किस भाषा में है और घर में इसका उपयोग कब होता है। संग्रह में विविधता आई और बच्चों को दूसरों की भाषा सुनने का अवसर मिला।
एक पद्धति सब जगह नहीं
हर विद्यालय की परिस्थिति अलग होती है। मौसम, जगह, सुरक्षा और बच्चों की जरूरत का ध्यान रखना होगा। किसी ऐतिहासिक संस्था के रूप को हूबहू दोहराना सभी के लिए संभव या उपयोगी नहीं। उससे प्रेरणा लेकर अपनी स्थिति में छोटे प्रयोग किए जा सकते हैं। प्रयोग का परिणाम देखकर सुधार करना, केवल नई चीज करने की घोषणा से अधिक महत्व रखता है।
कुछ सप्ताह बाद नीलिमा ने पाया कि बच्चे बाहर जाकर सिर्फ खेलने की अनुमति नहीं पूछते थे। वे अपने प्रश्न की कॉपी भी ले जाना चाहते थे। कमरे की पढ़ाई जारी थी, लेकिन उसके और आसपास की दुनिया के बीच रास्ता खुलने लगा था। शांतिनिकेतन की स्मृति हमें ऐसा ही प्रश्न दे सकती है: क्या शिक्षा में अनुभव, कला और जिज्ञासा को सचमुच स्थान है, या हम केवल उनकी सुंदर तस्वीर से संतुष्ट हैं?
संदर्भ और आगे पढ़ें
1. यूनेस्को विश्व धरोहर केंद्र: Santiniketan, शिक्षा और कला की विरासत
https://whc.unesco.org/en/list/1375/
चित्र संबंधी सूचना: थंबनेल इस लेख के लिए बनाया गया कल्पनात्मक चित्रांकन है; इसे वास्तविक घटना का फोटोग्राफ या ऐतिहासिक व्यक्ति का प्रमाणित चित्र न मानें।