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माता पिता कौन है ?

माता पिता कौन है ?

आचार्य जी · 4/5/2026

जब आप सुबह सोकर उठते हैं और अपने सामने रखे पानी के गिलास को उठाते हैं, तो क्या आपने कभी सोचा है कि उस गिलास को पकड़ने वाली उंगलियां और आपकी कलाई की हड्डियां कहाँ से आईं? हम अक्सर खुद को बहुत बड़ा और समझदार मानते हैं, हमें लगता है कि हम अपनी मेहनत से आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन कड़वा सच यह है कि हमारे शरीर का एक-एक कतरा हमारा अपना नहीं है। हम उधार के पुतले हैं। जब आप अपनी माँ के गर्भ में थे, तब आपके पास न अपनी सांस थी, न अपना खाना। आपने नौ महीने तक अपनी माँ की सांसों से ऑक्सीजन ली और उसके खून से अपना शरीर बनाया। माँ ने अपनी हड्डियों का कैल्शियम गलने दिया ताकि आपकी रीढ़ की हड्डी बन सके। उसने अपना रूप बिगाड़ लिया ताकि आपको एक सुंदर चेहरा मिल सके। यह कोई कहानी नहीं है, यह विज्ञान है। माँ के शरीर ने खुद को थोड़ा-थोड़ा खत्म किया ताकि आप पूरे बन सकें। जब आप पैदा हुए, तो आप दुनिया के सबसे कमजोर जीव थे। एक छोटा सा बच्चा अगर एक दिन के लिए अकेला छोड़ दिया जाए, तो वह बच नहीं सकता। उस समय आपकी माँ ने अपनी नींद का त्याग किया। वह रात भर जागती रही ताकि आपकी एक हल्की सी सुबकराहट पर वह आपको सीने से लगा सके। उसे कैसे पता चलता था कि आपको भूख लगी है या आप बीमार हैं? आपने तो बोलना भी नहीं सीखा था। वह आपकी चुप्पी को पढ़ती थी। उसने अपनी पसंद का खाना छोड़ दिया क्योंकि शायद वह आपको नुकसान पहुँचा सकता था। वह गीले में सोती रही ताकि आप सूखे में सो सकें। क्या आप सोच सकते हैं कि कोई अजनबी आपके लिए ऐसा करेगा? कभी नहीं।

फिर बारी आती है उस इंसान की जिसे हम पिता कहते हैं। पिता घर की उस मजबूत दीवार की तरह होते हैं जो धूप और बारिश को खुद पर झेल लेते हैं ताकि अंदर बैठे बच्चे सुरक्षित रहें। पिता का प्यार दिखता नहीं है, वह महसूस करना पड़ता है। जब आप नए कपड़े पहनकर स्कूल जाते थे, तब क्या आपने कभी अपने पिता के जूतों को गौर से देखा था? शायद वे नीचे से घिस चुके थे। उन्होंने अपने लिए नई कमीज नहीं खरीदी क्योंकि उन्हें आपकी स्कूल की फीस भरनी थी। वे दफ्तर में या बाहर धूप में लोगों की बातें सुनते रहे, अपमान सहते रहे, सिर्फ इसलिए कि शाम को वे आपके लिए वह खिलौना घर ला सकें जिसकी आपने जिद की थी। पिता वह इंसान है जो अपनी सारी इच्छाओं को एक पुराने संदूक में बंद कर देता है ताकि आपकी इच्छाओं के पंख निकल सकें। वे घर आकर थक कर सो जाते हैं और हमें लगता है कि वे सख्त हैं, लेकिन उनकी उस थकान के पीछे आपकी सफलता का सपना होता है। उन्होंने अपनी पूरी जवानी आपके भविष्य के नाम कर दी। जब आप गिरते थे, तो माँ रो पड़ती थी, लेकिन पिता आपको उठाकर फिर से खड़ा करते थे और कहते थे कि चोट नहीं लगी, तुम बहादुर हो। वे आपको दुनिया से लड़ने के लिए तैयार कर रहे थे क्योंकि उन्हें पता था कि एक दिन उन्हें चले जाना है और आपको अकेले ही यह जंग लड़नी है।

जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हम अपनी दुनिया बनाने लगते हैं। हमारे नए दोस्त बन जाते हैं, हमारा करियर शुरू हो जाता है और हम अपनी तरक्की की गिनती करने लगते हैं। हम कहने लगते हैं कि "मैंने इतनी पढ़ाई की", "मैंने इतनी मेहनत की और आज मैं यहाँ हूँ।" पर जरा रुकिए और सोचिए, क्या आप वहां तक पहुँच पाते अगर बचपन में आपकी माँ ने आपको बीमारियों से न बचाया होता? क्या आप वहां तक पहुँच पाते अगर आपके पिता ने अभावों के बीच भी आपको बेहतरीन शिक्षा न दिलाई होती? हम अक्सर अपने माता-पिता को यह कहकर चुप करा देते हैं कि "आपको आज की दुनिया के बारे में कुछ नहीं पता, आप पुराने जमाने के हैं।" यह कितनी अजीब बात है! जिस इंसान ने आपको बोलना सिखाया, आज आप उसे ही चुप रहने को कह रहे हैं। जिस इंसान ने आपका हाथ पकड़कर आपको पहला कदम चलना सिखाया, आज आप कह रहे हैं कि उन्हें आपके साथ चलने का सलीका नहीं है। सच तो यह है कि वे पुराने जरूर हो गए हैं, लेकिन उनके अनुभव की नींव पर ही आपकी आधुनिकता की इमारत खड़ी है। उनकी आँखें अब धुंधली हो गई हैं क्योंकि उन्होंने आपकी चमक देखने के लिए अपनी आँखों को थका लिया है। उनके हाथ अब कांपते हैं क्योंकि उन्होंने बरसों तक आपका बोझ उठाया है।

बुढ़ापा एक ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं है। आज वे कमजोर हो रहे हैं, वे बार-बार एक ही बात पूछते हैं, वे शायद नई तकनीक नहीं समझ पाते। पर क्या आपको याद है जब आप छोटे थे और आप भी एक ही सवाल सौ बार पूछते थे? तब आपकी माँ ने झुंझलाकर आपको चुप नहीं कराया था, बल्कि हर बार प्यार से जवाब दिया था। फिर आज हमारे पास उनके लिए पांच मिनट का समय क्यों नहीं है? हम अपने फोन पर अजनबियों से घंटों बात कर सकते हैं, लेकिन उस माँ के पास बैठकर उसकी बातें सुनने में हमें बोरियत होती है जिसने हमारे बिना बोले ही हमारी हर जरूरत समझ ली थी। हम उस पिता के साथ बैठने में कतराते हैं जिनकी एक डांट हमें कभी बुरी लगती थी, पर आज पता चलता है कि वह डांट ही हमें गलत रास्तों पर जाने से रोकती थी। तर्क यह कहता है कि अगर उन्होंने अपना पूरा जीवन हमें बनाने में लगा दिया, तो हमारा यह फर्ज बनता है कि हम उनके बुढ़ापे को सुकून से भर दें। यह कोई एहसान नहीं है, यह केवल उस कर्ज की एक छोटी सी किश्त है जिसे हम कभी पूरी तरह नहीं चुका सकते।

एक दिन ऐसा आएगा जब आप घर लौटेंगे और वहां वह कुर्सी खाली होगी जहाँ आपके पिता बैठते थे। वह रसोई शांत होगी जहाँ आपकी माँ के हाथों के खाने की खुशबू आती थी। उस दिन आप अपनी सारी दौलत, अपनी सारी डिग्रियां और अपनी सारी कामयाबी देकर भी उन्हें एक मिनट के लिए वापस नहीं बुला पाएंगे। तब आपको उनकी कमी खलती है। हम अक्सर उनके जाने के बाद उनकी तस्वीरों पर फूल चढ़ाते हैं और रोते हैं, लेकिन जीते जी उन्हें दो पल का प्यार नहीं दे पाते। क्या फायदा उस पछतावे का जब वक्त हाथ से निकल जाए? माता-पिता कोई भगवान की मूर्ति नहीं हैं जिन्हें सिर्फ मंदिर में पूजा जाए, वे तो जीते-जाते ईश्वर हैं जो आपके घर में मौजूद हैं। उनकी सेवा ही सबसे बड़ा तीर्थ है। अगर वे खुश हैं, तो मान लीजिए कि ईश्वर आपसे खुश है।

जरा सोचिए, जब वे नहीं होंगे, तो आपके पास उनकी यादों के अलावा क्या बचेगा? क्या आपके पास कोई ऐसी याद है जिसमें आपने उनके साथ बैठकर दिल की बातें की हों? क्या आपने कभी उन्हें बिना किसी मतलब के गले लगाया है और कहा है कि "माँ, मैं आज जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ"? क्या आपने कभी पिता के हाथ पकड़कर कहा है कि "पापा, अब आप आराम कीजिये, अब मैं सब संभाल लूँगा"? ये छोटे-छोटे शब्द उनके लिए किसी भी दवाई से बड़े होते हैं। उन्हें आपसे बंगला या गाड़ी नहीं चाहिए, उन्हें सिर्फ आपका सम्मान और आपका थोड़ा सा समय चाहिए। वे बस यह महसूस करना चाहते हैं कि वे अभी भी आपके लिए जरूरी हैं। उन्हें यह डर नहीं लगना चाहिए कि वे अब आपके ऊपर बोझ बन गए हैं।

अंत में, यह बात हमेशा याद रखना कि आप चाहे कितने भी बड़े आदमी बन जाओ, चाहे आप सात समंदर पार चले जाओ, आपकी जड़ें वहीं हैं जहाँ आपके माता-पिता हैं। वे उस पेड़ की तरह हैं जो खुद सूख जाता है लेकिन अपने फलों को मीठा बनाने के लिए अपना सब कुछ दान कर देता है। आपके शरीर में जो खून दौड़ रहा है, वह उनका है। आपकी आँखों में जो रोशनी है, वह उनकी दी हुई है। आपका नाम, आपकी पहचान, सब उन्हीं से शुरू होती है। इसलिए, पाखंड मत कीजिये, दिखावा मत कीजिये, बल्कि सच में उनके पास जाइये। उनकी झुर्रियों को देखिये, उनमें आपकी जीत की कहानियां छिपी हैं। उनके कांपते हाथों को थामिए, उनमें आपको पालने की मेहनत छिपी है। अगर आप आज उन्हें खुश कर पाए, तो समझिये कि आपका जीवन सफल हो गया। वरना, यह दुनिया की सारी भीड़ आपको कभी वह सुकून नहीं दे पाएगी जो माँ की गोद में और पिता के साये में मिलता है। वे आपके आधार हैं, और जब आधार टूटता है, तो पूरी जिंदगी बिखर जाती है। अभी वक्त है, उन्हें संभाल लीजिये, इससे पहले कि वे केवल एक पुरानी तस्वीर बन कर रह जाएं।

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