भगवान बनाने वाला भिखारी: मनुष्य का सबसे बड़ा पाखंड!
सृष्टि के इस अनंत और रहस्यमयी रंगमंच पर यदि किसी दर्शक को बैठाकर पृथ्वी का तमाशा दिखाया जाए, तो वह निश्चित रूप से एक ही प्राणी की गतिविधियों को देखकर कभी हँसेगा, कभी रोएगा, कभी क्रोधित होगा और कभी गहन विस्मय में डूब जाएगा। वह प्राणी है—मनुष्य। मानव का पूरा जीवनक्रम, उसकी मनोवैज्ञानिक यात्रा और उसका तथाकथित 'विकास' एक ऐसे गहरे और विचित्र प्रहसन (Farce) की तरह है, जिसमें करुणा, हास्य, रौद्र, भयानक, वीभत्स और अद्भुत—ये सभी रस एक साथ उबल रहे हैं। मनुष्य की कहानी इतनी विरोधाभासी है कि इसे पढ़ते हुए यह तय कर पाना कठिन हो जाता है कि हम ब्रह्मांड के सबसे कुशाग्र जीव की बात कर रहे हैं या सबसे बड़े मूर्ख की।
कथा की शुरुआत अत्यंत करुण और हास्यास्पद है। जीवन के आरंभिक बिंदु पर दृष्टि डालिए। जब एक मानव शिशु इस पृथ्वी पर अवतरित होता है, तो वह संभवतः पूरी प्रकृति का सबसे असहाय, परतंत्र और अक्षम लोथड़ा होता है। प्रकृति का व्यंग्य देखिए—जिन पशुओं को मनुष्य जीवन भर 'नीचा' और 'बुद्धिहीन' समझता है, उनके शावक जन्म के कुछ ही घंटों भीतर अपने पैरों पर खड़े होकर कुलांचे भरने लगते हैं। हिरण का बच्चा पैदा होते ही शेर से बचने के लिए दौड़ने का प्रयास करता है, पक्षी का चूजा कुछ ही दिनों में घोंसले से बाहर झाँककर अपना आहार तलाशने लगता है।
परंतु, भविष्य में स्वयं को 'सृष्टि का मुकुटमणि' कहने वाला यह मनुष्य? जन्म के समय यह इतना दरिद्र और लाचार होता है कि यदि इसके मुँह में कोई और निवाला न डाले, तो यह भूख से तड़पकर प्राण त्याग दे। यह स्वयं करवट तक नहीं बदल सकता। इसका अस्तित्व केवल इसके क्रंदन, अपनी ही गंदगी में लेटे रहने और दूसरों की दया पर निर्भर होता है। यह परतंत्रता की पराकाष्ठा है। यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि जो जीव अपने पहले ग्रास तक के लिए ब्रह्मांड का सबसे मोहताज प्राणी है, वही जीव आगे चलकर इस पूरे ब्रह्मांड को अपनी मुट्ठी में कैद करने का भ्रम पालेगा!
जैसे-जैसे कालचक्र आगे बढ़ता है, यह असहाय देह एक विचित्र चेतना से भर उठती है। जो हाथ कल तक अपने मुख तक नहीं पहुँच पाते थे, वे अब पहाड़ों का सीना चीरने लगते हैं। जो मस्तिष्क कल तक केवल रोने की ध्वनि उत्पन्न कर सकता था, वह अब नदियों के प्रवाह को मोड़ने, धातुओं को पिघलाने और गुरुत्वाकर्षण की छाती पर पैर रखकर अंतरिक्ष में उड़ने की योजनाएँ बनाने लगता है। यह 'अद्भुत' रस का क्षण है। मनुष्य की बुद्धि प्रकृति के हर रहस्य को उधेड़ कर रख देती है।
लेकिन इसी ज्ञान और शक्ति के साथ उसके भीतर जन्म लेता है—एक असीम अहंकार। वह स्वयं को अजेय समझने लगता है। परंतु, इस अहंकार के महल की नींव बहुत खोखली है। क्योंकि इतनी वैज्ञानिक और बौद्धिक प्रगति के बाद भी मनुष्य एक चीज़ से पार नहीं पा सका—'मृत्यु का भय' और 'अज्ञात का आतंक'। जब रात के सन्नाटे में वह अपनी नश्वरता के बारे में सोचता है, तो उसका सारा अहंकार कांपने लगता है। 'भयानक' रस उसके मन के भीतर सर्प की तरह फुंफकारने लगता है। इसी अनिश्चितता, जीवन के दुखों और मृत्यु के खौफ से बचने के लिए, मनुष्य एक ऐसी चाल चलता है जो उसके अस्तित्व का सबसे बड़ा मानसिक घोटाला है।
भयभीत और असुरक्षित मनुष्य एक ऐसा दुस्साहस कर बैठता है, जो विडंबना की चरम सीमा है। वह तय करता है कि वह उस सत्ता का निर्माण करेगा, जिसने कथित तौर पर इस पूरे ब्रह्मांड को बनाया है। ज़रा इस विचार की विकृति को समझिए—सृष्टि का एक तुच्छ सा कण, स्वयं स्रष्टा को गढ़ने निकल पड़ता है!
वह अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखता है और जंगल में जाकर एक वृक्ष काटता है। वह छैनी और हथौड़ा लेकर खदानों में जाता है और पत्थरों को तोड़ता है। वह नदी के किनारे बैठता है और गीली मिट्टी को गूंथता है। फिर अपनी ही उंगलियों के कौशल से, अपनी ही कल्पना के अनुसार वह उस निर्जीव लकड़ी, पत्थर या मिट्टी को एक आकार देता है। वह उसमें आँखें बनाता है, नाक उकेरता है, होठों पर मुस्कान चिपकाता है और उसे सुंदर वस्त्रों से ढंक देता है। यह मनुष्य की कला का चरमोत्कर्ष है, लेकिन साथ ही उसकी बुद्धि के पतन का पहला अध्याय भी। वह एक जड़ पदार्थ में 'प्राण-प्रतिष्ठा' के नाम पर कुछ मंत्र फूँकता है और रातों-रात वह पत्थर, जो कल तक किसी के पैरों की ठोकर खा रहा था, 'भगवान' बन जाता है।
यहाँ से कहानी एक ऐसे व्यंग्यात्मक और लगभग वीभत्स मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ मनुष्य की मानसिकता पर घिन भी आती है और तरस भी। अपनी ही गढ़ी हुई मूर्ति को एक भव्य सिंहासन पर आसीन करने के ठीक बाद, मनुष्य एक रहस्यमयी 'स्मृति-लोप' (Amnesia) का शिकार हो जाता है। वह पूरी तरह भूल जाता है कि इस मूर्ति की नाक उसने ही अपनी छैनी से तराशी थी।
अब वह अपनी ही रचना के सामने घुटने टेक देता है। जो हाथ कल तक पत्थर काट रहे थे, वे अब उसी पत्थर के सामने जुड़ जाते हैं। वह उसके आगे साष्टांग दंडवत होता है और गिड़गिड़ाने लगता है—"हे दीनानाथ! इस गरीब का घर भर दो। मेरी तिजोरी में धन बरसा दो। मेरे बेटे को पास करा दो। मेरे दुश्मन का नाश कर दो।" कितना अद्भुत प्रहसन है! मनुष्य ने अपने असीम स्वार्थ और अंतहीन लालच में 'परम-सत्ता' को एक लाचार कर्मचारी, एक क्लर्क या एक ऐसा एजेंट बनाकर रख दिया है, जिसका एकमात्र कार्य इस मनुष्य की सांसारिक और तुच्छ इच्छाओं की पूर्ति करना है। मनुष्य ने ईश्वर को अपने से भी अधिक तुच्छ बना दिया है। उसने भगवान को एक 'टूल' बना लिया है, जिसे वह अपनी सहूलियत के अनुसार इस्तेमाल करता है। यदि इच्छा पूरी हो गई, तो पत्थर पर कुछ मीठा चढ़ा दिया जाएगा (रिश्वत के रूप में), और यदि इच्छा पूरी नहीं हुई, तो वह किसी दूसरे पत्थर की ओर मुड़ जाएगा। यह विशुद्ध स्वार्थ है, जिसने अनंत को एक छोटे से मंदिर, मस्जिद या चर्च की चारदीवारी में कैद कर दिया है।
यदि यह सब केवल अशिक्षित, गँवार या आदिमानवों तक सीमित होता, तो शायद इसे अज्ञानता कहकर खारिज किया जा सकता था। परंतु, इस विडंबना का सबसे स्याह व्यंग्य तो यह है कि समाज के वे लोग जो स्वयं को 'बुद्धिमान', 'तार्किक', 'दार्शनिक' और 'वैज्ञानिक' कहते हैं, वे भी इसी कुएँ में भांग पिए बैठे हैं।
जो वैज्ञानिक दिन में प्रयोगशाला में बैठकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति (Big Bang) के समीकरण सुलझाता है, जो डॉक्टर दिन भर मानव शरीर की चीर-फाड़ करके यह साबित करता है कि देह केवल कोशिकाओं का समूह है, वही वैज्ञानिक और डॉक्टर शाम को अपने घर लौटकर अपनी ही खरीदी हुई एक निर्जीव धातु की मूर्ति के आगे दीया जलाकर अपने प्रमोशन या सफलता की भीख माँगता है। उनकी सारी तार्किकता, सारा विज्ञान, सारा ज्ञान उस एक चौखट पर आकर दम तोड़ देता है। वे यह समझने में पूरी तरह विफल रहते हैं कि वे उस शक्ति से अपने जीवन की सुरक्षा माँग रहे हैं, जिसकी अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने मंदिर के बाहर लोहे का ताला और सिक्योरिटी गार्ड लगा रखा है!
मनुष्य के इस डर, स्वार्थ और मूर्खता को कुछ चतुर लोगों ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। और यहीं से जन्म हुआ दुनिया के सबसे बड़े, सबसे सुरक्षित और सबसे अधिक मुनाफे वाले व्यापार का—'धर्म और अंधभक्ति का बाज़ार'।
इस व्यापार में न कोई कच्चा माल लगता है, न कोई फैक्ट्री लगानी पड़ती है और न ही कोई टैक्स देना पड़ता है। इस व्यापार का कच्चा माल है—'इंसान का डर'। उत्पादों का नाम है—'पुण्य, स्वर्ग और चमत्कार'। इस बाज़ार के व्यापारी बहुत चतुर हैं। उन्होंने इस पाषाण-पूजा और कर्मकांड को इतने भव्य, डरावने और रहस्यमयी आवरण में लपेट दिया है कि एक आम आदमी इसके खिलाफ बोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। उसे डराया जाता है कि यदि उसने इस रची हुई व्यवस्था पर सवाल उठाया, तो वह अदृश्य सत्ता उसे भस्म कर देगी। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि इंसान की लाचारी का इस्तेमाल करके एक पूरा सिंडिकेट खड़ा कर दिया गया है, जो उसकी जेब भी काटता है और उसे मानसिक रूप से अपाहिज भी बनाए रखता है। मनुष्य इस पूरे तंत्र में केवल एक उपभोक्ता (Consumer) बनकर रह गया है, जो जीवन भर अदृश्य भयों की ईएमआई (EMI) चुकाता रहता है।
इस पूरी यात्रा का जब हम तटस्थ भाव से विश्लेषण करते हैं, तो मन एक अजीब सी शून्यता (शांत रस) से भर जाता है। मनुष्य की यह कहानी न तो कोई विकास यात्रा है और न ही कोई पतन। यह केवल एक अंतहीन गोल चक्कर है।
हम आज भी मनोवैज्ञानिक रूप से उसी बिंदु पर खड़े हैं जहाँ हमारा जन्म हुआ था—'पूर्णतः असहाय और परतंत्र'। जन्म के समय हम अपनी माँ के दूध और सहारे के लिए रोते थे, और आज मृत्यु के भय से हम अपनी ही बनाई पत्थर की मूर्तियों और काल्पनिक देवताओं के सहारे के लिए रो रहे हैं। हमारी शक्लें बदल गई हैं, हमारे उपकरण बदल गए हैं, हमारी भाषाएँ परिष्कृत हो गई हैं, लेकिन भीतर बैठा वह डरा हुआ, असहाय शिशु आज भी वैसा का वैसा ही है।
शायद यही मनुष्य की नियति है। वह एक ऐसा कुशल मूर्तिकार है जो अपने ही गढ़े हुए भ्रमों के बुने हुए जाल में इस कदर फँस चुका है कि उसे वही जाल अपना घर, अपना सत्य और अपना रक्षक लगने लगा है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के इस आदिम भय और स्वार्थ को नहीं जीत लेता, तब तक वह चाहे मंगल ग्रह पर बस्तियां बसा ले या अमरत्व का अमृत खोज ले, वह अपने ही बनाए गए पाषाण के देवताओं के सामने हमेशा एक असहाय याचक की तरह हाथ फैलाए ही खड़ा रहेगा। यही इस अस्तित्व का सबसे रहस्यमयी, कड़वा और अकाट्य सत्य है।
कथा की शुरुआत अत्यंत करुण और हास्यास्पद है। जीवन के आरंभिक बिंदु पर दृष्टि डालिए। जब एक मानव शिशु इस पृथ्वी पर अवतरित होता है, तो वह संभवतः पूरी प्रकृति का सबसे असहाय, परतंत्र और अक्षम लोथड़ा होता है। प्रकृति का व्यंग्य देखिए—जिन पशुओं को मनुष्य जीवन भर 'नीचा' और 'बुद्धिहीन' समझता है, उनके शावक जन्म के कुछ ही घंटों भीतर अपने पैरों पर खड़े होकर कुलांचे भरने लगते हैं। हिरण का बच्चा पैदा होते ही शेर से बचने के लिए दौड़ने का प्रयास करता है, पक्षी का चूजा कुछ ही दिनों में घोंसले से बाहर झाँककर अपना आहार तलाशने लगता है।
परंतु, भविष्य में स्वयं को 'सृष्टि का मुकुटमणि' कहने वाला यह मनुष्य? जन्म के समय यह इतना दरिद्र और लाचार होता है कि यदि इसके मुँह में कोई और निवाला न डाले, तो यह भूख से तड़पकर प्राण त्याग दे। यह स्वयं करवट तक नहीं बदल सकता। इसका अस्तित्व केवल इसके क्रंदन, अपनी ही गंदगी में लेटे रहने और दूसरों की दया पर निर्भर होता है। यह परतंत्रता की पराकाष्ठा है। यह कितना बड़ा व्यंग्य है कि जो जीव अपने पहले ग्रास तक के लिए ब्रह्मांड का सबसे मोहताज प्राणी है, वही जीव आगे चलकर इस पूरे ब्रह्मांड को अपनी मुट्ठी में कैद करने का भ्रम पालेगा!
जैसे-जैसे कालचक्र आगे बढ़ता है, यह असहाय देह एक विचित्र चेतना से भर उठती है। जो हाथ कल तक अपने मुख तक नहीं पहुँच पाते थे, वे अब पहाड़ों का सीना चीरने लगते हैं। जो मस्तिष्क कल तक केवल रोने की ध्वनि उत्पन्न कर सकता था, वह अब नदियों के प्रवाह को मोड़ने, धातुओं को पिघलाने और गुरुत्वाकर्षण की छाती पर पैर रखकर अंतरिक्ष में उड़ने की योजनाएँ बनाने लगता है। यह 'अद्भुत' रस का क्षण है। मनुष्य की बुद्धि प्रकृति के हर रहस्य को उधेड़ कर रख देती है।
लेकिन इसी ज्ञान और शक्ति के साथ उसके भीतर जन्म लेता है—एक असीम अहंकार। वह स्वयं को अजेय समझने लगता है। परंतु, इस अहंकार के महल की नींव बहुत खोखली है। क्योंकि इतनी वैज्ञानिक और बौद्धिक प्रगति के बाद भी मनुष्य एक चीज़ से पार नहीं पा सका—'मृत्यु का भय' और 'अज्ञात का आतंक'। जब रात के सन्नाटे में वह अपनी नश्वरता के बारे में सोचता है, तो उसका सारा अहंकार कांपने लगता है। 'भयानक' रस उसके मन के भीतर सर्प की तरह फुंफकारने लगता है। इसी अनिश्चितता, जीवन के दुखों और मृत्यु के खौफ से बचने के लिए, मनुष्य एक ऐसी चाल चलता है जो उसके अस्तित्व का सबसे बड़ा मानसिक घोटाला है।
भयभीत और असुरक्षित मनुष्य एक ऐसा दुस्साहस कर बैठता है, जो विडंबना की चरम सीमा है। वह तय करता है कि वह उस सत्ता का निर्माण करेगा, जिसने कथित तौर पर इस पूरे ब्रह्मांड को बनाया है। ज़रा इस विचार की विकृति को समझिए—सृष्टि का एक तुच्छ सा कण, स्वयं स्रष्टा को गढ़ने निकल पड़ता है!
वह अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखता है और जंगल में जाकर एक वृक्ष काटता है। वह छैनी और हथौड़ा लेकर खदानों में जाता है और पत्थरों को तोड़ता है। वह नदी के किनारे बैठता है और गीली मिट्टी को गूंथता है। फिर अपनी ही उंगलियों के कौशल से, अपनी ही कल्पना के अनुसार वह उस निर्जीव लकड़ी, पत्थर या मिट्टी को एक आकार देता है। वह उसमें आँखें बनाता है, नाक उकेरता है, होठों पर मुस्कान चिपकाता है और उसे सुंदर वस्त्रों से ढंक देता है। यह मनुष्य की कला का चरमोत्कर्ष है, लेकिन साथ ही उसकी बुद्धि के पतन का पहला अध्याय भी। वह एक जड़ पदार्थ में 'प्राण-प्रतिष्ठा' के नाम पर कुछ मंत्र फूँकता है और रातों-रात वह पत्थर, जो कल तक किसी के पैरों की ठोकर खा रहा था, 'भगवान' बन जाता है।
यहाँ से कहानी एक ऐसे व्यंग्यात्मक और लगभग वीभत्स मोड़ पर पहुँचती है, जहाँ मनुष्य की मानसिकता पर घिन भी आती है और तरस भी। अपनी ही गढ़ी हुई मूर्ति को एक भव्य सिंहासन पर आसीन करने के ठीक बाद, मनुष्य एक रहस्यमयी 'स्मृति-लोप' (Amnesia) का शिकार हो जाता है। वह पूरी तरह भूल जाता है कि इस मूर्ति की नाक उसने ही अपनी छैनी से तराशी थी।
अब वह अपनी ही रचना के सामने घुटने टेक देता है। जो हाथ कल तक पत्थर काट रहे थे, वे अब उसी पत्थर के सामने जुड़ जाते हैं। वह उसके आगे साष्टांग दंडवत होता है और गिड़गिड़ाने लगता है—"हे दीनानाथ! इस गरीब का घर भर दो। मेरी तिजोरी में धन बरसा दो। मेरे बेटे को पास करा दो। मेरे दुश्मन का नाश कर दो।" कितना अद्भुत प्रहसन है! मनुष्य ने अपने असीम स्वार्थ और अंतहीन लालच में 'परम-सत्ता' को एक लाचार कर्मचारी, एक क्लर्क या एक ऐसा एजेंट बनाकर रख दिया है, जिसका एकमात्र कार्य इस मनुष्य की सांसारिक और तुच्छ इच्छाओं की पूर्ति करना है। मनुष्य ने ईश्वर को अपने से भी अधिक तुच्छ बना दिया है। उसने भगवान को एक 'टूल' बना लिया है, जिसे वह अपनी सहूलियत के अनुसार इस्तेमाल करता है। यदि इच्छा पूरी हो गई, तो पत्थर पर कुछ मीठा चढ़ा दिया जाएगा (रिश्वत के रूप में), और यदि इच्छा पूरी नहीं हुई, तो वह किसी दूसरे पत्थर की ओर मुड़ जाएगा। यह विशुद्ध स्वार्थ है, जिसने अनंत को एक छोटे से मंदिर, मस्जिद या चर्च की चारदीवारी में कैद कर दिया है।
यदि यह सब केवल अशिक्षित, गँवार या आदिमानवों तक सीमित होता, तो शायद इसे अज्ञानता कहकर खारिज किया जा सकता था। परंतु, इस विडंबना का सबसे स्याह व्यंग्य तो यह है कि समाज के वे लोग जो स्वयं को 'बुद्धिमान', 'तार्किक', 'दार्शनिक' और 'वैज्ञानिक' कहते हैं, वे भी इसी कुएँ में भांग पिए बैठे हैं।
जो वैज्ञानिक दिन में प्रयोगशाला में बैठकर ब्रह्मांड की उत्पत्ति (Big Bang) के समीकरण सुलझाता है, जो डॉक्टर दिन भर मानव शरीर की चीर-फाड़ करके यह साबित करता है कि देह केवल कोशिकाओं का समूह है, वही वैज्ञानिक और डॉक्टर शाम को अपने घर लौटकर अपनी ही खरीदी हुई एक निर्जीव धातु की मूर्ति के आगे दीया जलाकर अपने प्रमोशन या सफलता की भीख माँगता है। उनकी सारी तार्किकता, सारा विज्ञान, सारा ज्ञान उस एक चौखट पर आकर दम तोड़ देता है। वे यह समझने में पूरी तरह विफल रहते हैं कि वे उस शक्ति से अपने जीवन की सुरक्षा माँग रहे हैं, जिसकी अपनी सुरक्षा के लिए उन्होंने मंदिर के बाहर लोहे का ताला और सिक्योरिटी गार्ड लगा रखा है!
मनुष्य के इस डर, स्वार्थ और मूर्खता को कुछ चतुर लोगों ने बहुत पहले ही पहचान लिया था। और यहीं से जन्म हुआ दुनिया के सबसे बड़े, सबसे सुरक्षित और सबसे अधिक मुनाफे वाले व्यापार का—'धर्म और अंधभक्ति का बाज़ार'।
इस व्यापार में न कोई कच्चा माल लगता है, न कोई फैक्ट्री लगानी पड़ती है और न ही कोई टैक्स देना पड़ता है। इस व्यापार का कच्चा माल है—'इंसान का डर'। उत्पादों का नाम है—'पुण्य, स्वर्ग और चमत्कार'। इस बाज़ार के व्यापारी बहुत चतुर हैं। उन्होंने इस पाषाण-पूजा और कर्मकांड को इतने भव्य, डरावने और रहस्यमयी आवरण में लपेट दिया है कि एक आम आदमी इसके खिलाफ बोलने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाता। उसे डराया जाता है कि यदि उसने इस रची हुई व्यवस्था पर सवाल उठाया, तो वह अदृश्य सत्ता उसे भस्म कर देगी। यह कितनी बड़ी त्रासदी है कि इंसान की लाचारी का इस्तेमाल करके एक पूरा सिंडिकेट खड़ा कर दिया गया है, जो उसकी जेब भी काटता है और उसे मानसिक रूप से अपाहिज भी बनाए रखता है। मनुष्य इस पूरे तंत्र में केवल एक उपभोक्ता (Consumer) बनकर रह गया है, जो जीवन भर अदृश्य भयों की ईएमआई (EMI) चुकाता रहता है।
इस पूरी यात्रा का जब हम तटस्थ भाव से विश्लेषण करते हैं, तो मन एक अजीब सी शून्यता (शांत रस) से भर जाता है। मनुष्य की यह कहानी न तो कोई विकास यात्रा है और न ही कोई पतन। यह केवल एक अंतहीन गोल चक्कर है।
हम आज भी मनोवैज्ञानिक रूप से उसी बिंदु पर खड़े हैं जहाँ हमारा जन्म हुआ था—'पूर्णतः असहाय और परतंत्र'। जन्म के समय हम अपनी माँ के दूध और सहारे के लिए रोते थे, और आज मृत्यु के भय से हम अपनी ही बनाई पत्थर की मूर्तियों और काल्पनिक देवताओं के सहारे के लिए रो रहे हैं। हमारी शक्लें बदल गई हैं, हमारे उपकरण बदल गए हैं, हमारी भाषाएँ परिष्कृत हो गई हैं, लेकिन भीतर बैठा वह डरा हुआ, असहाय शिशु आज भी वैसा का वैसा ही है।
शायद यही मनुष्य की नियति है। वह एक ऐसा कुशल मूर्तिकार है जो अपने ही गढ़े हुए भ्रमों के बुने हुए जाल में इस कदर फँस चुका है कि उसे वही जाल अपना घर, अपना सत्य और अपना रक्षक लगने लगा है। जब तक मनुष्य अपने भीतर के इस आदिम भय और स्वार्थ को नहीं जीत लेता, तब तक वह चाहे मंगल ग्रह पर बस्तियां बसा ले या अमरत्व का अमृत खोज ले, वह अपने ही बनाए गए पाषाण के देवताओं के सामने हमेशा एक असहाय याचक की तरह हाथ फैलाए ही खड़ा रहेगा। यही इस अस्तित्व का सबसे रहस्यमयी, कड़वा और अकाट्य सत्य है।