समय नहीं मिलता या हम समय का सही उपयोग नहीं करते?
कैलेंडर की खाली जगह
सुजाता ने अपनी पुरानी ड्राइंग कॉपी निकालकर फिर वापस रख दी। वह चित्र बनाना सीखना चाहती थी। हर महीने कहती कि इस बार समय निकालूँगी। नौकरी, घर और बच्चों के बीच उसे लगता था कि दिन केवल दूसरों के लिए निकल जाता है। उस शाम सहेली ने पूछा कि सप्ताहांत की छोटी चित्रकला कक्षा में आएगी क्या। सुजाता ने तुरंत कहा कि समय नहीं है। रात को सोने से पहले उसने फोन देखा। कई वीडियो के बाद जब घड़ी देखी तो चालीस मिनट बीत चुके थे। उसने सोचा कि ये मिनट तो थकान के बाद आराम के थे। चित्र बनाने के लिए अलग समय चाहिए। लेकिन वह अलग समय कैसा होगा, यह उसने कभी स्पष्ट नहीं किया था।
अगले दिन कक्षा का पंजीकरण बंद हो गया। सुजाता ने सहेली का बनाया चित्र देखा और फिर अपने दिन पर क्रोध आया। उसे लगा कि उसके जीवन में अपने लिए कोई स्थान नहीं। सहेली ने कहा कि पहले तीन दिन का समय लिखकर देखे। सुजाता ने इसे एक और काम समझा, फिर छोटी डायरी में लिखना शुरू किया। कब उठी, किस काम में कितना समय गया, किन बातों पर इंतजार किया और कहाँ ध्यान बँटा। तीसरे दिन तक वह अपनी वास्तविक जिम्मेदारियाँ भी देख पा रही थी और कुछ ऐसे हिस्से भी जो अनजाने में निकल जाते थे। दोनों को एक ही नाम देकर वह कह रही थी कि उसके पास बिल्कुल समय नहीं।
जिम्मेदारियों का सही हिसाब
डायरी में घर के काम का बड़ा हिस्सा दिखाई दिया। यह कल्पना नहीं था। नौकरी के बाद खाना, बच्चों की तैयारी और कई छोटी जिम्मेदारियाँ उसके पास थीं। पति ने सूची देखी तो कहा कि कुछ काम बाँट सकते हैं। सुजाता को पहली बार लगा कि समय का उपयोग केवल व्यक्तिगत कठोरता का प्रश्न नहीं। किसी परिवार में जिम्मेदारी असमान हो तो एक व्यक्ति से और दक्ष बनने की मांग समाधान नहीं। उन्होंने खरीद और अगले दिन की तैयारी का हिस्सा बाँटा। बच्चों ने अपना सामान रखने का छोटा काम लिया। सुजाता ने किसी का सहयोग अपने शौक के लिए एहसान नहीं माना। घर साझा जीवन है, इसलिए उसका काम भी साझा हो सकता है।
दूसरा हिस्सा छोटे-छोटे व्यवधानों का था। किसी काम के बीच फोन की सूचना देखना, फिर संदेश का उत्तर और फिर नया विषय। काम पर लौटते समय फिर समझना पड़ता कि कहाँ थी। उसने आवश्यक संपर्कों की सूचना रखी, बाकी सीमित की। घर के काम के बाद कुछ आराम का समय भी स्पष्ट रखा। वह आराम छीनकर ही चित्रकला को जगह नहीं देना चाहती थी। थके व्यक्ति को हर खाली मिनट उपलब्ध श्रम मानना गलत है। उसने देखा कि कुछ स्क्रीन समय विश्राम देता है, कुछ केवल और बेचैनी। उपयोगी आराम बचाकर अनजाने में निकलने वाले हिस्से कम किए। इस बदलाव से थोड़ी वास्तविक अवधि सामने आई।
समय का नाम रखना
सुजाता पहले कहती थी कि खाली होगी तो चित्र बनाएगी। अब उसने मंगलवार और गुरुवार शाम बीस मिनट तय किए। समय छोटा था, लेकिन नाम मिला। मेज पर कागज और पेंसिल पहले से रखे। उस समय उसे क्या सीखना है स्पष्ट था: एक साधारण वस्तु का आकार देखना और बनाना। उसने पूरे चित्र की शर्त नहीं रखी। पहले दिन उसने कप बनाया। गलत था, फिर भी कागज पर कुछ बना। उस बीस मिनट ने उसे एहसास दिया कि सीखने का जीवन आरंभ हो सकता है। उपलब्ध समय को बहुत छोटा समझकर छोड़ देना भी समय खोना था। कुछ कार्य छोटी अवधि में शुरू हो सकते हैं, भले पूरी सीख लंबे समय में आए।
दफ्तर में भी उसने दिन का सबसे जरूरी काम पहले पहचानना शुरू किया। ईमेल आते ही हर संदेश को बराबर जरूरी नहीं माना। जो तत्काल आवश्यक था, उसे किया; बाकी के लिए समय रखा। जब अतिरिक्त काम मिले तो समय सीमा स्पष्ट पूछी। सब काम एक साथ पूरा करने का मौन वादा उसे देर तक रोकता था। उसने जहाँ जरूरत हो मदद या प्राथमिकता पूछी। समय के सही उपयोग का अर्थ तेजी से सब करने का दावा नहीं। कभी काम की संख्या और अपेक्षा साफ करनी पड़ती है। गलत दिशा में बहुत दक्ष होना भी दिन भर सकता है, लेकिन आवश्यक परिणाम पीछे रह जाता है। वह अपने समय की जिम्मेदारी के साथ उसकी सीमाएँ कहना सीख रही थी।
हर आग्रह को हाँ नहीं
पड़ोस की एक परिचित अक्सर बिना बताए लंबी बातचीत के लिए आती। सुजाता उसे बुरा नहीं लगना चाहती थी। उस दिन चित्रकला का समय फिर निकल जाता। उसने विनम्रता से कहा कि अभी अपना तय काम है, किसी अन्य समय बैठ सकती हैं। उसे पहले अपराधबोध हुआ। फिर देखा कि परिचित ने दूसरी शाम का समय मान लिया। अपने समय के लिए सीमा रखना संबंध से बेरुखी नहीं था। लोगों को उसके काम का पता तभी चलता जब वह बताए। लेकिन उसने जरूरी सहायता माँगने वाले को केवल समय सारिणी दिखाकर नहीं लौटाया। उसने परिस्थिति का महत्व देखा। सीमा में विवेक चाहिए, कठोर दीवार नहीं।
एक सप्ताह कार्यालय में अतिरिक्त काम के कारण दोनों अभ्यास छूट गए। सुजाता ने सोचा कि फिर वही हुआ। डायरी पढ़ने पर दिखा कि पिछले चार सप्ताह में कई अभ्यास हुए थे। दो छूटे समय पूरी कोशिश नहीं मिटाते। उसने अगले सप्ताह कम अवधि रखी और लौट गई। समय का उपयोग देखने के लिए बड़ी योजना नहीं, वास्तविक रिकॉर्ड उपयोगी था। उससे वह खुद को बिना कारण दोषी नहीं ठहराती और जहाँ बदलाव संभव हो वहाँ बहाना भी नहीं बनाती। वह सच देख सकती थी कि कौन सी बाधा बाहर की है, कौन सी व्यवस्था की और कौन सी अनजानी आदत की। तभी सही बदलाव चुना जा सकता था।
पहली पूरी तस्वीर
दो महीने बाद उसने खिड़की पर रखा पौधा बनाया। चित्र सामान्य था, लेकिन पूरा था। बच्चे ने कहा कि घर की खिड़की ऐसी ही लगती है। सुजाता ने उसे मेज के पास रखा। अब उसे अपनी रुचि के बारे में कहते समय केवल भविष्य का वाक्य नहीं कहना पड़ता था। वह चित्र बनाती थी, थोड़ा और सीखना चाहती थी। काम, घर और थकान समाप्त नहीं हुए थे। मगर जीवन में अपना चुना हुआ छोटा समय था। इसी से वह बाकी दिन को केवल दूसरों की मांग के रूप में कम देखने लगी। अपने लिए समय होना दूसरों से प्रेम कम नहीं करता। कभी वह भीतर का संतोष बढ़ाकर संबंधों में अधिक सहजता लाता है।
अगली कक्षा की सूचना आई तो सुजाता ने तुरंत पंजीकरण नहीं किया। पहले यात्रा, फीस और घर की व्यवस्था देखी। परिवार से बात की और उपलब्धता सुनिश्चित की। अब फैसला केवल उत्साह या केवल समय नहीं होने की घोषणा पर नहीं था। जहाँ जाना संभव था, उसने किया। जहाँ नहीं होता, अगला विकल्प रखती। उसे समझ आया कि समय सचमुच सीमित है। सभी रुचियाँ एक साथ नहीं निभेंगी। चयन करना पड़ेगा। लेकिन चयन अपनी प्राथमिकता से करना और जीवन को पूरी तरह व्यस्तता के हवाले कर देना अलग हैं। छोटे समय का सम्मान करने से वह अपने बड़े चुनाव भी अधिक साफ कर पा रही थी।
समय न मिलने का अनुभव कभी वास्तविक बोझ से आता है और कभी समय को बिना दिशा बहने देने से। पहले अपनी परिस्थिति देखें, आरोप न लगाएँ। काम बाँटना, आवश्यक विश्राम बचाना, ध्यान के व्यवधान कम करना, विनम्र सीमा रखना और चुने काम को निश्चित छोटी अवधि देना उपयोगी हो सकते हैं। सबको समान चौबीस घंटे कहकर असमान जिम्मेदारियाँ छिपाना सही नहीं। सुजाता ने अपने दिन को जादू से लंबा नहीं किया था। उसने उसमें उपलब्ध और योग्य जगह पहचानी। उसकी ड्राइंग कॉपी अब अलमारी में किसी भविष्य की छुट्टी की प्रतीक्षा नहीं करती थी। सप्ताह में दो बार खुलती, और उन पन्नों पर उसके अपने जीवन की खिड़की धीरे आकार लेने लगी थी।
सुजाता ने अपनी पुरानी ड्राइंग कॉपी निकालकर फिर वापस रख दी। वह चित्र बनाना सीखना चाहती थी। हर महीने कहती कि इस बार समय निकालूँगी। नौकरी, घर और बच्चों के बीच उसे लगता था कि दिन केवल दूसरों के लिए निकल जाता है। उस शाम सहेली ने पूछा कि सप्ताहांत की छोटी चित्रकला कक्षा में आएगी क्या। सुजाता ने तुरंत कहा कि समय नहीं है। रात को सोने से पहले उसने फोन देखा। कई वीडियो के बाद जब घड़ी देखी तो चालीस मिनट बीत चुके थे। उसने सोचा कि ये मिनट तो थकान के बाद आराम के थे। चित्र बनाने के लिए अलग समय चाहिए। लेकिन वह अलग समय कैसा होगा, यह उसने कभी स्पष्ट नहीं किया था।
अगले दिन कक्षा का पंजीकरण बंद हो गया। सुजाता ने सहेली का बनाया चित्र देखा और फिर अपने दिन पर क्रोध आया। उसे लगा कि उसके जीवन में अपने लिए कोई स्थान नहीं। सहेली ने कहा कि पहले तीन दिन का समय लिखकर देखे। सुजाता ने इसे एक और काम समझा, फिर छोटी डायरी में लिखना शुरू किया। कब उठी, किस काम में कितना समय गया, किन बातों पर इंतजार किया और कहाँ ध्यान बँटा। तीसरे दिन तक वह अपनी वास्तविक जिम्मेदारियाँ भी देख पा रही थी और कुछ ऐसे हिस्से भी जो अनजाने में निकल जाते थे। दोनों को एक ही नाम देकर वह कह रही थी कि उसके पास बिल्कुल समय नहीं।
जिम्मेदारियों का सही हिसाब
डायरी में घर के काम का बड़ा हिस्सा दिखाई दिया। यह कल्पना नहीं था। नौकरी के बाद खाना, बच्चों की तैयारी और कई छोटी जिम्मेदारियाँ उसके पास थीं। पति ने सूची देखी तो कहा कि कुछ काम बाँट सकते हैं। सुजाता को पहली बार लगा कि समय का उपयोग केवल व्यक्तिगत कठोरता का प्रश्न नहीं। किसी परिवार में जिम्मेदारी असमान हो तो एक व्यक्ति से और दक्ष बनने की मांग समाधान नहीं। उन्होंने खरीद और अगले दिन की तैयारी का हिस्सा बाँटा। बच्चों ने अपना सामान रखने का छोटा काम लिया। सुजाता ने किसी का सहयोग अपने शौक के लिए एहसान नहीं माना। घर साझा जीवन है, इसलिए उसका काम भी साझा हो सकता है।
दूसरा हिस्सा छोटे-छोटे व्यवधानों का था। किसी काम के बीच फोन की सूचना देखना, फिर संदेश का उत्तर और फिर नया विषय। काम पर लौटते समय फिर समझना पड़ता कि कहाँ थी। उसने आवश्यक संपर्कों की सूचना रखी, बाकी सीमित की। घर के काम के बाद कुछ आराम का समय भी स्पष्ट रखा। वह आराम छीनकर ही चित्रकला को जगह नहीं देना चाहती थी। थके व्यक्ति को हर खाली मिनट उपलब्ध श्रम मानना गलत है। उसने देखा कि कुछ स्क्रीन समय विश्राम देता है, कुछ केवल और बेचैनी। उपयोगी आराम बचाकर अनजाने में निकलने वाले हिस्से कम किए। इस बदलाव से थोड़ी वास्तविक अवधि सामने आई।
समय का नाम रखना
सुजाता पहले कहती थी कि खाली होगी तो चित्र बनाएगी। अब उसने मंगलवार और गुरुवार शाम बीस मिनट तय किए। समय छोटा था, लेकिन नाम मिला। मेज पर कागज और पेंसिल पहले से रखे। उस समय उसे क्या सीखना है स्पष्ट था: एक साधारण वस्तु का आकार देखना और बनाना। उसने पूरे चित्र की शर्त नहीं रखी। पहले दिन उसने कप बनाया। गलत था, फिर भी कागज पर कुछ बना। उस बीस मिनट ने उसे एहसास दिया कि सीखने का जीवन आरंभ हो सकता है। उपलब्ध समय को बहुत छोटा समझकर छोड़ देना भी समय खोना था। कुछ कार्य छोटी अवधि में शुरू हो सकते हैं, भले पूरी सीख लंबे समय में आए।
दफ्तर में भी उसने दिन का सबसे जरूरी काम पहले पहचानना शुरू किया। ईमेल आते ही हर संदेश को बराबर जरूरी नहीं माना। जो तत्काल आवश्यक था, उसे किया; बाकी के लिए समय रखा। जब अतिरिक्त काम मिले तो समय सीमा स्पष्ट पूछी। सब काम एक साथ पूरा करने का मौन वादा उसे देर तक रोकता था। उसने जहाँ जरूरत हो मदद या प्राथमिकता पूछी। समय के सही उपयोग का अर्थ तेजी से सब करने का दावा नहीं। कभी काम की संख्या और अपेक्षा साफ करनी पड़ती है। गलत दिशा में बहुत दक्ष होना भी दिन भर सकता है, लेकिन आवश्यक परिणाम पीछे रह जाता है। वह अपने समय की जिम्मेदारी के साथ उसकी सीमाएँ कहना सीख रही थी।
हर आग्रह को हाँ नहीं
पड़ोस की एक परिचित अक्सर बिना बताए लंबी बातचीत के लिए आती। सुजाता उसे बुरा नहीं लगना चाहती थी। उस दिन चित्रकला का समय फिर निकल जाता। उसने विनम्रता से कहा कि अभी अपना तय काम है, किसी अन्य समय बैठ सकती हैं। उसे पहले अपराधबोध हुआ। फिर देखा कि परिचित ने दूसरी शाम का समय मान लिया। अपने समय के लिए सीमा रखना संबंध से बेरुखी नहीं था। लोगों को उसके काम का पता तभी चलता जब वह बताए। लेकिन उसने जरूरी सहायता माँगने वाले को केवल समय सारिणी दिखाकर नहीं लौटाया। उसने परिस्थिति का महत्व देखा। सीमा में विवेक चाहिए, कठोर दीवार नहीं।
एक सप्ताह कार्यालय में अतिरिक्त काम के कारण दोनों अभ्यास छूट गए। सुजाता ने सोचा कि फिर वही हुआ। डायरी पढ़ने पर दिखा कि पिछले चार सप्ताह में कई अभ्यास हुए थे। दो छूटे समय पूरी कोशिश नहीं मिटाते। उसने अगले सप्ताह कम अवधि रखी और लौट गई। समय का उपयोग देखने के लिए बड़ी योजना नहीं, वास्तविक रिकॉर्ड उपयोगी था। उससे वह खुद को बिना कारण दोषी नहीं ठहराती और जहाँ बदलाव संभव हो वहाँ बहाना भी नहीं बनाती। वह सच देख सकती थी कि कौन सी बाधा बाहर की है, कौन सी व्यवस्था की और कौन सी अनजानी आदत की। तभी सही बदलाव चुना जा सकता था।
पहली पूरी तस्वीर
दो महीने बाद उसने खिड़की पर रखा पौधा बनाया। चित्र सामान्य था, लेकिन पूरा था। बच्चे ने कहा कि घर की खिड़की ऐसी ही लगती है। सुजाता ने उसे मेज के पास रखा। अब उसे अपनी रुचि के बारे में कहते समय केवल भविष्य का वाक्य नहीं कहना पड़ता था। वह चित्र बनाती थी, थोड़ा और सीखना चाहती थी। काम, घर और थकान समाप्त नहीं हुए थे। मगर जीवन में अपना चुना हुआ छोटा समय था। इसी से वह बाकी दिन को केवल दूसरों की मांग के रूप में कम देखने लगी। अपने लिए समय होना दूसरों से प्रेम कम नहीं करता। कभी वह भीतर का संतोष बढ़ाकर संबंधों में अधिक सहजता लाता है।
अगली कक्षा की सूचना आई तो सुजाता ने तुरंत पंजीकरण नहीं किया। पहले यात्रा, फीस और घर की व्यवस्था देखी। परिवार से बात की और उपलब्धता सुनिश्चित की। अब फैसला केवल उत्साह या केवल समय नहीं होने की घोषणा पर नहीं था। जहाँ जाना संभव था, उसने किया। जहाँ नहीं होता, अगला विकल्प रखती। उसे समझ आया कि समय सचमुच सीमित है। सभी रुचियाँ एक साथ नहीं निभेंगी। चयन करना पड़ेगा। लेकिन चयन अपनी प्राथमिकता से करना और जीवन को पूरी तरह व्यस्तता के हवाले कर देना अलग हैं। छोटे समय का सम्मान करने से वह अपने बड़े चुनाव भी अधिक साफ कर पा रही थी।
समय न मिलने का अनुभव कभी वास्तविक बोझ से आता है और कभी समय को बिना दिशा बहने देने से। पहले अपनी परिस्थिति देखें, आरोप न लगाएँ। काम बाँटना, आवश्यक विश्राम बचाना, ध्यान के व्यवधान कम करना, विनम्र सीमा रखना और चुने काम को निश्चित छोटी अवधि देना उपयोगी हो सकते हैं। सबको समान चौबीस घंटे कहकर असमान जिम्मेदारियाँ छिपाना सही नहीं। सुजाता ने अपने दिन को जादू से लंबा नहीं किया था। उसने उसमें उपलब्ध और योग्य जगह पहचानी। उसकी ड्राइंग कॉपी अब अलमारी में किसी भविष्य की छुट्टी की प्रतीक्षा नहीं करती थी। सप्ताह में दो बार खुलती, और उन पन्नों पर उसके अपने जीवन की खिड़की धीरे आकार लेने लगी थी।