जीवन में लक्ष्य होना क्यों आवश्यक है?
मेज पर रखे सात आवेदन
निखिल की मेज पर सात आवेदन थे। एक बैंक की परीक्षा का, एक कंप्यूटर पाठ्यक्रम का, एक बिक्री की नौकरी का और कुछ ऐसे कामों के जिनका विवरण उसने ठीक से पढ़ा भी नहीं था। स्नातक हुए डेढ़ वर्ष बीत गया था। हर महीने कोई परिचित नया रास्ता बताता और वह कुछ दिन उसी में लग जाता। कभी लगता कि सरकारी नौकरी ही ठीक है, कभी तुरंत आय चाहिए, कभी कोई ऑनलाइन काम उसे सबसे अच्छा भविष्य दिखाने लगता। वह निष्क्रिय नहीं था। बहुत खोजता, बहुत शुरू करता और बार बार दिशा बदल देता। उस सुबह एक छोटे कार्यालय में साक्षात्कार था। उसे सबसे अधिक डर कठिन प्रश्नों का था। जिस प्रश्न पर वह अटका, वह बहुत साधारण निकला।
कार्यालय के संचालक ने पूछा, “छह महीने बाद आप अपने काम में क्या कर पाना चाहते हैं?” निखिल ने कहा कि वह कोई भी काम सीख सकता है। संचालक ने फिर पूछा, “अभी किस काम की तैयारी कर रहे हैं?” उसने तीन अलग बातें बता दीं। बातचीत समाप्त हुई तो उसे लगा कि वह पढ़ा लिखा है, फिर भी अपने अगले कदम की साफ बात क्यों नहीं कह पाया। बाहर चाय की दुकान पर मित्र फैजान मिला। उसने सात आवेदनों के बारे में सुनकर हँसते हुए कहा, “एक आवेदन आठवाँ भी रखो—आवेदन व्यवस्थित करने वाले कर्मचारी का।” निखिल भी हँसा। फिर दोनों चुप हो गए। मजाक के पीछे उसकी वास्तविक उलझन बैठी थी।
घर लौटकर माँ ने पूछा कि बात कैसी रही। उसने कहा, “देखते हैं।” यह उत्तर वह कई महीनों से देता आ रहा था। माँ ने उसे खाना दिया और किसी नई सलाह के बजाय बस बैठ गईं। मेज पर रखा पुराना कपड़े का थैला निखिल ने पहचाना। पिता उसी में अपने काम के कागज ले जाते थे। अब उनकी नियमित आय कम हो गई थी और घर का हिसाब सावधानी से चलता। निखिल ने माँ से पूछा कि वह परेशान हैं क्या। माँ बोलीं, “परेशान पैसे से भी हूँ। उससे ज्यादा तुम्हें हर सप्ताह खुद से नाराज देखकर होती हूँ। कोई एक रास्ता समझकर चलो, इतना तो अपने लिए कर लो।”
व्यस्त खोज और स्पष्ट दिशा
निखिल अगले दिन अपने पुराने अध्यापक अरविंद से मिला। उसने कहा कि उसे शायद कोई बहुत बड़ा लक्ष्य चाहिए। अध्यापक ने पूछा, “बड़ा क्यों?” निखिल बोला कि तभी जीवन सफल लगेगा। उन्होंने कहा कि जीवन का लक्ष्य दिखावे की ऊँचाई से नहीं, उसके अर्थ और व्यवहार से भी तय होता है। अभी उसे कोई ऐसा उद्देश्य चाहिए जिसके अनुसार समय, सीखने और काम का निर्णय कर सके। अस्पष्ट भविष्य की चिंता उसे बहुत व्यस्त रख रही थी, लेकिन उसकी ऊर्जा किस दिशा में जुड़ रही है, यह साफ नहीं था।
उन्होंने निखिल को तीन अलग प्रश्न लिखने को दिए। उसे किस काम में रुचि है, वह किस काम की क्षमता विकसित कर सकता है और घर की परिस्थिति के अनुसार कितनी जल्दी आय जरूरी है? केवल रुचि देखें तो आर्थिक समय छूट सकता है। केवल जल्दी आय देखें तो सीखने की दिशा दब सकती है। केवल दूसरों की प्रतिष्ठा देखें तो अपना स्वभाव अनदेखा रह जाता है। इन बातों का संतुलन ही उसके लिए व्यावहारिक लक्ष्य बना सकता था। कोई और उसके जीवन की पूरी परिस्थिति नहीं जानता था। सलाह ली जा सकती थी, अंतिम जिम्मेदार चयन उसे करना था।
निखिल को सूचनाएँ व्यवस्थित करना अच्छा लगता था। कॉलेज में कार्यक्रम की सूची, खर्च और समयसारणी वही बनाता था। कंप्यूटर पर सामान्य काम जानता था, लेकिन व्यवस्थित कार्यालय काम और स्प्रेडशीट में कौशल अधूरा था। उसे यह भी स्पष्ट था कि छह महीने तक केवल तैयारी करते रहना घर के लिए कठिन होगा। उन्होंने योजना बनाई कि वह सामान्य कार्यालय सहायक के काम के लिए अपनी क्षमता बढ़ाएगा, छोटे व्यावहारिक काम का अनुभव लेगा और आय के अवसर खोजेगा। यह जीवनभर के लिए बंद दरवाजा नहीं था। अगले चरण की स्पष्ट दिशा थी।
लक्ष्य को काम में अनुवाद करें
निखिल ने लिखा कि अगले छह महीनों में वह दफ्तर के सामान्य अभिलेख, तालिका और समयसारणी का काम भरोसेमंद ढंग से कर सकेगा और संबंधित नौकरी के लिए तैयार होगा। फिर उसने छोटे चरण रखे। पहले बुनियादी कौशल की समीक्षा, फिर नमूने तैयार करना, फिर वास्तविक काम में अभ्यास और आवेदन। “कुछ अच्छा करना है” से यह लक्ष्य अलग था। उसमें देखा जा सकता था कि क्या सीखना है और प्रगति का कौन सा प्रमाण बनेगा। लक्ष्य तभी उपयोगी है जब वह अगले सप्ताह के काम तक रास्ता दिखाए।
उसने एक स्थानीय दुकान के मालिक से पुराने माल की सूची साफ करने का छोटा काम लिया। भुगतान बहुत कम था। काम भी उसकी कल्पना से कठिन निकला। नामों की अलग वर्तनी, अधूरी संख्या और बार बार बदलता विवरण। पहले दिन उसने सोचा कि यह उसके योग्य काम नहीं। फिर उसे अपने लक्ष्य की बात याद आई—भरोसेमंद सामान्य कार्यालय काम करना। वास्तविक कौशल केवल सुंदर पाठ्यक्रम के शीर्षक में नहीं मिलेगा। उसने अस्पष्ट विवरण पूछा, गलती सुधारी और काम पूरा करने की तिथि तय की।
घर में बहन ने उसकी पहली तालिका देखी। उसने तीन पंक्तियों में एक ही वस्तु अलग नाम से लिखी देखी। बोली, “भैया, एक डिब्बा तीन बार गिनोगे तो दुकान नहीं, जादू की दुकान बनेगी।” निखिल हँस पड़ा और विवरण जाँचा। वह बहन की बात को अपमान की तरह नहीं ले रहा था। अब उसके पास सीखने की दिशा थी, इसलिए सुधार उपयोगी लग रहा था। जब लक्ष्य अस्पष्ट हो, तो छोटी गलती भी अपनी पूरी योग्यता पर फैसला लग सकती है। स्पष्ट दिशा में वही गलती अगले अभ्यास का संकेत बन सकती है।
नया अवसर आया, क्या सब छोड़ दे?
तीसरे सप्ताह एक परिचित ने दूसरे शहर में काम की सूचना दी। कहा कि आय तुरंत शुरू होगी। विवरण अस्पष्ट था और रहने का खर्च साफ नहीं था। निखिल पहले ही दिन टिकट खोजने लगा। फिर अध्यापक से बात की। उन्होंने अवसर को खराब नहीं कहा। केवल पूछा कि काम, भुगतान, खर्च और उसकी योजना के बीच संबंध क्या है। निखिल ने जानकारी माँगी। पता चला कि अनुमानित आय में कई शर्तें थीं। उसने निर्णय टालकर पूरा विवरण देखा। लक्ष्य का लाभ केवल आगे धकेलना नहीं, हर चमकदार अवसर पर रुककर उचित प्रश्न पूछना भी है।
उसने सरकारी परीक्षा के पुराने आवेदन भी देखे। यदि तैयारी करनी है तो उसके लिए वास्तविक समय, रुचि और आर्थिक व्यवस्था चाहिए। केवल दूसरों की बात सुनकर हर परीक्षा में नाम डालना दिशा नहीं बनाता। उसने तत्काल कुछ आवेदन छोड़े और एक विकल्प बाद की समीक्षा के लिए रखा। चुनाव करने में एक प्रकार का दुख था। सभी संभावनाएँ खुली रखने पर लगता कि कुछ खोया नहीं। लेकिन समय सीमित था। सब शुरू करके कुछ भी ठीक से न सीखना भी नुकसान था। एक दिशा चुनने से कुछ अवसर पीछे रहेंगे; यही चयन की जिम्मेदारी है।
माँ ने एक रात पूछा कि क्या अब उसे अपना रास्ता मिल गया। निखिल ने कहा, “पूरा जीवन नहीं मालूम। अभी छह महीने का काम साफ है।” माँ ने राहत की साँस ली। उसे लगा कि उनसे वह पहले अत्यधिक वादा करता था। अब बात छोटी थी, पर उसमें विवरण था। उन्होंने अपने पुराने थैले से एक खाली फाइल निकाल दी। बोलीं, “अपने काम के नमूने इसमें रखना।” निखिल ने उसे लिया तो अचानक आँखें भर आईं। परिवार ने उसके लिए कोई बड़ा पुरस्कार नहीं रखा था। उसे मेहनत के प्रमाण सँभालने की जगह दी थी।
दिशा बदलना और भटकना अलग हैं
दो महीने बाद उसने देखा कि कुछ सीखने में अनुमान से अधिक समय लग रहा है। उसने तिथियाँ बदलीं, उद्देश्य नहीं छोड़ा। एक काम में रुचि कम हुई तो कारण देखा। क्या थकान है, कौशल की कठिनाई है या सचमुच काम उसके स्वभाव से नहीं मिलता? लक्ष्य का अर्थ हर परिस्थिति में अपनी पहली योजना से चिपके रहना नहीं। नई जानकारी पर उचित संशोधन भी जिम्मेदारी है। फर्क यह है कि दिशा सोचकर बदले, हर दिन की ऊब या किसी और की खबर से नहीं।
उसे एक छोटे कार्यालय में अंशकालिक काम मिला। आय सीमित थी, पर नियमित काम और सीखने का अवसर था। उसने यह नहीं माना कि अब जीवन सफल घोषित हो गया। आगे कौशल, स्थिर आय और घर की मदद के लक्ष्य बने। साथ में उसने विश्राम और परिवार की जिम्मेदारी भी रखी। जीवन का लक्ष्य केवल नौकरी का नाम नहीं होना चाहिए। अच्छा मनुष्य बने रहना, ईमानदारी से काम करना, संबंध निभाना और अपनी उपलब्ध क्षमता का उचित उपयोग भी दिशा का हिस्सा हैं। आर्थिक उद्देश्य जरूरी है, लेकिन वह पूरे जीवन का अकेला माप नहीं।
छह महीने बाद फिर किसी ने पूछा कि आगे क्या करना चाहता है। निखिल ने शांत होकर वर्तमान काम और अगला कौशल बताया। उसे हर संभावना का उत्तर नहीं पता था। फिर भी उसका दिन अब बिना दिशा की खोज में नहीं खोता था। मेज पर सात आवेदन के स्थान पर एक स्पष्ट सूची, काम के नमूने और सीखने की कॉपी थी। उसने फैजान को तस्वीर भेजी। मित्र ने लिखा, “आठवें आवेदन की नौकरी अब तुम्हें मिल गई—अपना काम व्यवस्थित करना।” इस बार दोनों हँसे, और उस हँसी में राहत अधिक थी।
जीवन में लक्ष्य इसलिए आवश्यक है कि वह सीमित समय और ऊर्जा को अर्थपूर्ण दिशा देता है। वह प्राथमिकता चुनने, अवसर जाँचने और कठिन दिन में अगला कदम पहचानने में सहायक होता है। उसका बड़ा, प्रसिद्ध या दूसरों जैसा होना जरूरी नहीं। अपनी परिस्थिति, मूल्य और क्षमता के अनुसार स्पष्ट हो, इतना जरूरी है। लक्ष्य न होने पर व्यक्ति का मूल्य कम नहीं हो जाता; कभी उलझन जीवन का स्वाभाविक चरण भी है। पर उस चरण में ठहरकर दिशा चुनना उपयोगी है। निखिल को पूरा भविष्य नहीं मिला था। उसे आज के काम और अगले चरण का संबंध मिला। उसी संबंध ने उसकी मेहनत को केवल गतिविधि से आगे बढ़ाकर उद्देश्य दिया।
निखिल की मेज पर सात आवेदन थे। एक बैंक की परीक्षा का, एक कंप्यूटर पाठ्यक्रम का, एक बिक्री की नौकरी का और कुछ ऐसे कामों के जिनका विवरण उसने ठीक से पढ़ा भी नहीं था। स्नातक हुए डेढ़ वर्ष बीत गया था। हर महीने कोई परिचित नया रास्ता बताता और वह कुछ दिन उसी में लग जाता। कभी लगता कि सरकारी नौकरी ही ठीक है, कभी तुरंत आय चाहिए, कभी कोई ऑनलाइन काम उसे सबसे अच्छा भविष्य दिखाने लगता। वह निष्क्रिय नहीं था। बहुत खोजता, बहुत शुरू करता और बार बार दिशा बदल देता। उस सुबह एक छोटे कार्यालय में साक्षात्कार था। उसे सबसे अधिक डर कठिन प्रश्नों का था। जिस प्रश्न पर वह अटका, वह बहुत साधारण निकला।
कार्यालय के संचालक ने पूछा, “छह महीने बाद आप अपने काम में क्या कर पाना चाहते हैं?” निखिल ने कहा कि वह कोई भी काम सीख सकता है। संचालक ने फिर पूछा, “अभी किस काम की तैयारी कर रहे हैं?” उसने तीन अलग बातें बता दीं। बातचीत समाप्त हुई तो उसे लगा कि वह पढ़ा लिखा है, फिर भी अपने अगले कदम की साफ बात क्यों नहीं कह पाया। बाहर चाय की दुकान पर मित्र फैजान मिला। उसने सात आवेदनों के बारे में सुनकर हँसते हुए कहा, “एक आवेदन आठवाँ भी रखो—आवेदन व्यवस्थित करने वाले कर्मचारी का।” निखिल भी हँसा। फिर दोनों चुप हो गए। मजाक के पीछे उसकी वास्तविक उलझन बैठी थी।
घर लौटकर माँ ने पूछा कि बात कैसी रही। उसने कहा, “देखते हैं।” यह उत्तर वह कई महीनों से देता आ रहा था। माँ ने उसे खाना दिया और किसी नई सलाह के बजाय बस बैठ गईं। मेज पर रखा पुराना कपड़े का थैला निखिल ने पहचाना। पिता उसी में अपने काम के कागज ले जाते थे। अब उनकी नियमित आय कम हो गई थी और घर का हिसाब सावधानी से चलता। निखिल ने माँ से पूछा कि वह परेशान हैं क्या। माँ बोलीं, “परेशान पैसे से भी हूँ। उससे ज्यादा तुम्हें हर सप्ताह खुद से नाराज देखकर होती हूँ। कोई एक रास्ता समझकर चलो, इतना तो अपने लिए कर लो।”
व्यस्त खोज और स्पष्ट दिशा
निखिल अगले दिन अपने पुराने अध्यापक अरविंद से मिला। उसने कहा कि उसे शायद कोई बहुत बड़ा लक्ष्य चाहिए। अध्यापक ने पूछा, “बड़ा क्यों?” निखिल बोला कि तभी जीवन सफल लगेगा। उन्होंने कहा कि जीवन का लक्ष्य दिखावे की ऊँचाई से नहीं, उसके अर्थ और व्यवहार से भी तय होता है। अभी उसे कोई ऐसा उद्देश्य चाहिए जिसके अनुसार समय, सीखने और काम का निर्णय कर सके। अस्पष्ट भविष्य की चिंता उसे बहुत व्यस्त रख रही थी, लेकिन उसकी ऊर्जा किस दिशा में जुड़ रही है, यह साफ नहीं था।
उन्होंने निखिल को तीन अलग प्रश्न लिखने को दिए। उसे किस काम में रुचि है, वह किस काम की क्षमता विकसित कर सकता है और घर की परिस्थिति के अनुसार कितनी जल्दी आय जरूरी है? केवल रुचि देखें तो आर्थिक समय छूट सकता है। केवल जल्दी आय देखें तो सीखने की दिशा दब सकती है। केवल दूसरों की प्रतिष्ठा देखें तो अपना स्वभाव अनदेखा रह जाता है। इन बातों का संतुलन ही उसके लिए व्यावहारिक लक्ष्य बना सकता था। कोई और उसके जीवन की पूरी परिस्थिति नहीं जानता था। सलाह ली जा सकती थी, अंतिम जिम्मेदार चयन उसे करना था।
निखिल को सूचनाएँ व्यवस्थित करना अच्छा लगता था। कॉलेज में कार्यक्रम की सूची, खर्च और समयसारणी वही बनाता था। कंप्यूटर पर सामान्य काम जानता था, लेकिन व्यवस्थित कार्यालय काम और स्प्रेडशीट में कौशल अधूरा था। उसे यह भी स्पष्ट था कि छह महीने तक केवल तैयारी करते रहना घर के लिए कठिन होगा। उन्होंने योजना बनाई कि वह सामान्य कार्यालय सहायक के काम के लिए अपनी क्षमता बढ़ाएगा, छोटे व्यावहारिक काम का अनुभव लेगा और आय के अवसर खोजेगा। यह जीवनभर के लिए बंद दरवाजा नहीं था। अगले चरण की स्पष्ट दिशा थी।
लक्ष्य को काम में अनुवाद करें
निखिल ने लिखा कि अगले छह महीनों में वह दफ्तर के सामान्य अभिलेख, तालिका और समयसारणी का काम भरोसेमंद ढंग से कर सकेगा और संबंधित नौकरी के लिए तैयार होगा। फिर उसने छोटे चरण रखे। पहले बुनियादी कौशल की समीक्षा, फिर नमूने तैयार करना, फिर वास्तविक काम में अभ्यास और आवेदन। “कुछ अच्छा करना है” से यह लक्ष्य अलग था। उसमें देखा जा सकता था कि क्या सीखना है और प्रगति का कौन सा प्रमाण बनेगा। लक्ष्य तभी उपयोगी है जब वह अगले सप्ताह के काम तक रास्ता दिखाए।
उसने एक स्थानीय दुकान के मालिक से पुराने माल की सूची साफ करने का छोटा काम लिया। भुगतान बहुत कम था। काम भी उसकी कल्पना से कठिन निकला। नामों की अलग वर्तनी, अधूरी संख्या और बार बार बदलता विवरण। पहले दिन उसने सोचा कि यह उसके योग्य काम नहीं। फिर उसे अपने लक्ष्य की बात याद आई—भरोसेमंद सामान्य कार्यालय काम करना। वास्तविक कौशल केवल सुंदर पाठ्यक्रम के शीर्षक में नहीं मिलेगा। उसने अस्पष्ट विवरण पूछा, गलती सुधारी और काम पूरा करने की तिथि तय की।
घर में बहन ने उसकी पहली तालिका देखी। उसने तीन पंक्तियों में एक ही वस्तु अलग नाम से लिखी देखी। बोली, “भैया, एक डिब्बा तीन बार गिनोगे तो दुकान नहीं, जादू की दुकान बनेगी।” निखिल हँस पड़ा और विवरण जाँचा। वह बहन की बात को अपमान की तरह नहीं ले रहा था। अब उसके पास सीखने की दिशा थी, इसलिए सुधार उपयोगी लग रहा था। जब लक्ष्य अस्पष्ट हो, तो छोटी गलती भी अपनी पूरी योग्यता पर फैसला लग सकती है। स्पष्ट दिशा में वही गलती अगले अभ्यास का संकेत बन सकती है।
नया अवसर आया, क्या सब छोड़ दे?
तीसरे सप्ताह एक परिचित ने दूसरे शहर में काम की सूचना दी। कहा कि आय तुरंत शुरू होगी। विवरण अस्पष्ट था और रहने का खर्च साफ नहीं था। निखिल पहले ही दिन टिकट खोजने लगा। फिर अध्यापक से बात की। उन्होंने अवसर को खराब नहीं कहा। केवल पूछा कि काम, भुगतान, खर्च और उसकी योजना के बीच संबंध क्या है। निखिल ने जानकारी माँगी। पता चला कि अनुमानित आय में कई शर्तें थीं। उसने निर्णय टालकर पूरा विवरण देखा। लक्ष्य का लाभ केवल आगे धकेलना नहीं, हर चमकदार अवसर पर रुककर उचित प्रश्न पूछना भी है।
उसने सरकारी परीक्षा के पुराने आवेदन भी देखे। यदि तैयारी करनी है तो उसके लिए वास्तविक समय, रुचि और आर्थिक व्यवस्था चाहिए। केवल दूसरों की बात सुनकर हर परीक्षा में नाम डालना दिशा नहीं बनाता। उसने तत्काल कुछ आवेदन छोड़े और एक विकल्प बाद की समीक्षा के लिए रखा। चुनाव करने में एक प्रकार का दुख था। सभी संभावनाएँ खुली रखने पर लगता कि कुछ खोया नहीं। लेकिन समय सीमित था। सब शुरू करके कुछ भी ठीक से न सीखना भी नुकसान था। एक दिशा चुनने से कुछ अवसर पीछे रहेंगे; यही चयन की जिम्मेदारी है।
माँ ने एक रात पूछा कि क्या अब उसे अपना रास्ता मिल गया। निखिल ने कहा, “पूरा जीवन नहीं मालूम। अभी छह महीने का काम साफ है।” माँ ने राहत की साँस ली। उसे लगा कि उनसे वह पहले अत्यधिक वादा करता था। अब बात छोटी थी, पर उसमें विवरण था। उन्होंने अपने पुराने थैले से एक खाली फाइल निकाल दी। बोलीं, “अपने काम के नमूने इसमें रखना।” निखिल ने उसे लिया तो अचानक आँखें भर आईं। परिवार ने उसके लिए कोई बड़ा पुरस्कार नहीं रखा था। उसे मेहनत के प्रमाण सँभालने की जगह दी थी।
दिशा बदलना और भटकना अलग हैं
दो महीने बाद उसने देखा कि कुछ सीखने में अनुमान से अधिक समय लग रहा है। उसने तिथियाँ बदलीं, उद्देश्य नहीं छोड़ा। एक काम में रुचि कम हुई तो कारण देखा। क्या थकान है, कौशल की कठिनाई है या सचमुच काम उसके स्वभाव से नहीं मिलता? लक्ष्य का अर्थ हर परिस्थिति में अपनी पहली योजना से चिपके रहना नहीं। नई जानकारी पर उचित संशोधन भी जिम्मेदारी है। फर्क यह है कि दिशा सोचकर बदले, हर दिन की ऊब या किसी और की खबर से नहीं।
उसे एक छोटे कार्यालय में अंशकालिक काम मिला। आय सीमित थी, पर नियमित काम और सीखने का अवसर था। उसने यह नहीं माना कि अब जीवन सफल घोषित हो गया। आगे कौशल, स्थिर आय और घर की मदद के लक्ष्य बने। साथ में उसने विश्राम और परिवार की जिम्मेदारी भी रखी। जीवन का लक्ष्य केवल नौकरी का नाम नहीं होना चाहिए। अच्छा मनुष्य बने रहना, ईमानदारी से काम करना, संबंध निभाना और अपनी उपलब्ध क्षमता का उचित उपयोग भी दिशा का हिस्सा हैं। आर्थिक उद्देश्य जरूरी है, लेकिन वह पूरे जीवन का अकेला माप नहीं।
छह महीने बाद फिर किसी ने पूछा कि आगे क्या करना चाहता है। निखिल ने शांत होकर वर्तमान काम और अगला कौशल बताया। उसे हर संभावना का उत्तर नहीं पता था। फिर भी उसका दिन अब बिना दिशा की खोज में नहीं खोता था। मेज पर सात आवेदन के स्थान पर एक स्पष्ट सूची, काम के नमूने और सीखने की कॉपी थी। उसने फैजान को तस्वीर भेजी। मित्र ने लिखा, “आठवें आवेदन की नौकरी अब तुम्हें मिल गई—अपना काम व्यवस्थित करना।” इस बार दोनों हँसे, और उस हँसी में राहत अधिक थी।
जीवन में लक्ष्य इसलिए आवश्यक है कि वह सीमित समय और ऊर्जा को अर्थपूर्ण दिशा देता है। वह प्राथमिकता चुनने, अवसर जाँचने और कठिन दिन में अगला कदम पहचानने में सहायक होता है। उसका बड़ा, प्रसिद्ध या दूसरों जैसा होना जरूरी नहीं। अपनी परिस्थिति, मूल्य और क्षमता के अनुसार स्पष्ट हो, इतना जरूरी है। लक्ष्य न होने पर व्यक्ति का मूल्य कम नहीं हो जाता; कभी उलझन जीवन का स्वाभाविक चरण भी है। पर उस चरण में ठहरकर दिशा चुनना उपयोगी है। निखिल को पूरा भविष्य नहीं मिला था। उसे आज के काम और अगले चरण का संबंध मिला। उसी संबंध ने उसकी मेहनत को केवल गतिविधि से आगे बढ़ाकर उद्देश्य दिया।