मोबाइल हमारे जीवन का साधन है या स्वामी बन चुका है?
मेज पर रखा हुआ फोन
अनिरुद्ध को उस शाम पहली बार डर लगा कि उसके पिता सचमुच घर छोड़कर चले गए हैं। दरवाजे के पास उनकी चप्पलें नहीं थीं, कमरे की कुर्सी खाली थी और फोन घर पर रखा था। उसने पड़ोस में पूछा, बाजार की ओर दौड़ा और फिर पत्नी को फोन किया। तभी उसकी छह साल की बेटी ने कहा, “दादाजी ने आपको बताया था।” अनिरुद्ध ठिठक गया। कब बताया था? उसे केवल इतना याद था कि दोपहर में वह बैठक में बैठा था और काम से संबंधित संदेश देख रहा था। पिता उसके पास आए थे, कुछ बोले थे और उसने बिना सिर उठाए हाँ कहा था।
वे पास के पुराने परिचित के घर गए थे। लौटे तो अनिरुद्ध ने राहत के साथ शिकायत भी की। “जाते समय बता तो देते!” पिता ने शांत आवाज में कहा, “बेटा, दो बार बताया था। तुमने कहा था ठीक है।” अनिरुद्ध उत्तर देने लगा कि बहुत जरूरी काम था, फिर बेटी का चेहरा देखकर चुप हो गया। उस शाम उसे याद आया कि स्कूल के कार्यक्रम की तारीख भी वह सुन नहीं पाया था। घर में लोग बोलते थे, उसकी ओर देखते थे, और वह एक छोटे चमकते पर्दे के भीतर किसी दूसरी जगह मौजूद रहता था।
रात में उसने फोन दूर रखा, पर कुछ मिनट बाद हाथ फिर उसी तरफ चला गया। कोई जरूरी संदेश नहीं था। उसने मौसम देखा, फिर समाचार, फिर एक वीडियो। आधा घंटा बीत गया। उसे लगा कि फोन उसके हाथ में है, इसलिए नियंत्रण भी उसी का होगा। लेकिन उसका हाथ कब और क्यों उठ रहा था, इसका उत्तर उसके पास नहीं था। मोबाइल उपयोगी साधन था। काम, भुगतान, रास्ता और दूर बैठे लोगों से बातचीत उसी से होती थी। सवाल उसकी उपयोगिता का नहीं, उस जगह का था जो उसने जीवन में बिना पूछे घेर ली थी।
जरूरी काम की आड़
अगले दिन उसने अपने फोन का उपयोग विवरण देखा। वह आँकड़ा देखकर चौंका, मगर तुरंत कारण भी गिनाने लगा। नौकरी में फोन चाहिए, समूहों में सूचना आती है, खाली समय में थोड़ा मनोरंजन बुरा नहीं। पत्नी ने कहा, “सारा समय गलत नहीं है। पर जरूरी काम समाप्त होने के बाद भी तुम वहीं क्यों रहते हो?” इस सवाल का उत्तर आँकड़े में नहीं था। उसने तय किया कि तीन दिन केवल यह लिखेगा कि फोन किस कारण उठाया और उसके बाद क्या किया। वह कोई कड़ा नियम बनाने से पहले अपनी आदत को पहचानना चाहता था।
पहले दिन सूची में बार बार वही कारण आया, कोई कारण नहीं। चाय बनते समय, लिफ्ट की प्रतीक्षा में, भोजन के बाद, बातचीत के बीच और रात में सोने से पहले उसने फोन खोला था। एक संदेश देखने गया और कई दूसरे पन्ने खोलता रहा। उसने पाया कि छोटे खाली क्षण अब उसे असहज करते हैं। पहले उन्हीं क्षणों में वह आसपास देखता, किसी से बात करता या अपने दिन के बारे में सोचता था। अब हर विराम भरने की वस्तु बन गया था। उसका ध्यान लगातार बुलाया जा रहा था और वह हर बुलावे पर उपस्थित हो जाता था।
तीसरे दिन पिता ने उसके सामने चाय रखी। अनिरुद्ध ने स्क्रीन बंद की और पूछा, “उस मित्र के यहाँ क्या काम था?” पिता ने बताया कि उनका मित्र घर बेचने की सोच रहा है। यह बात पहले भी उन्होंने कही थी, मगर अनिरुद्ध ने नहीं सुनी थी। दस मिनट की बातचीत में उसे एक पूरा जीवन दिखाई दिया, जिसमें पुरानी मित्रता, बीमारी नहीं बल्कि उम्र का अकेलापन, और घर बदलने का कठिन निर्णय था। वह सोचता रहा कि जिनके साथ रहता है, उनकी कहानी से वह कितना अनजान हो गया है। फोन ने बात रोकी नहीं थी; उसने प्राथमिकता बदल दी थी।
पहला नियम और पहली हार
अनिरुद्ध ने उत्साह में तय किया कि अब शाम सात बजे के बाद फोन नहीं छुएगा। दूसरे ही दिन कार्यालय से जरूरी कॉल आया और नियम टूट गया। उसने सोचा कि उसके काम में कोई सीमा संभव नहीं। फिर उसने अंतर समझा। जरूरी कॉल लेने की सुविधा और लगातार हर सूचना देखने की आदत एक ही चीज नहीं हैं। उसने नियम बदला। रात के भोजन पर फोन मेज पर नहीं आएगा। काम का आवश्यक कॉल आ सकता है, लेकिन मनोरंजन और समूह संदेश बाद में देखे जाएँगे। परिवार को भी पता रहेगा कि कब वास्तव में काम है और कब सिर्फ भटकना है।
उसने अनावश्यक सूचनाएँ बंद कीं। जिन लोगों के तत्काल फोन जरूरी थे, उनके लिए रास्ता खुला रखा। सामाजिक मंचों को पहले पृष्ठ से हटाया और सुबह उठते ही देखने के बजाय नाश्ते के बाद निर्धारित समय चुना। फोन रात में तकिए के पास रखने की जगह कमरे की दूसरी मेज पर रखा। ये छोटे परिवर्तन थे। वे उसके संकल्प को आसान बना रहे थे। यदि ध्यान खींचने वाली वस्तु हर समय हाथ की दूरी पर हो तो हर बार इच्छाशक्ति से लड़ना पड़ता है। उपयोग का वातावरण बदलने से कुछ लड़ाइयाँ शुरू होने से पहले ही घट जाती हैं।
पहले सप्ताह में वह कई बार नियम भूल गया। बेटी कहानी सुनाते समय वह अनजाने में फोन उठा चुका था। उसने बहाना करने के बजाय फोन रखकर कहा, “मैं बीच में हट गया था, फिर से सुनाओ।” इससे बेटी की हर बात लंबी और सुंदर नहीं हो गई, पर उसे सुनने वाला व्यक्ति मिला। अनिरुद्ध ने जाना कि सीमा टूटने पर बचाव करने की जरूरत नहीं है। उस क्षण वापस आना ज्यादा उपयोगी है। अपने व्यवहार की गलती स्वीकार करना परिवार को भी यह सिखाता है कि नियम केवल बच्चों के लिए नहीं होते।
खाली जगह का असली उपयोग
फोन कम करने से समय अपने आप अच्छा नहीं हो गया। पहली शाम वह बेचैन होकर कमरे में घूमता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आधे घंटे में क्या करे। उसने पिता से पुराने घर के बारे में पूछा। अगले दिन बेटी के साथ छत पर गया। फिर एक छोटी पुस्तक शुरू की, जिसे उसने महीनों पहले खरीदा था। विकल्प तैयार करना जरूरी निकला। केवल किसी आदत को रोक देने से बनी खाली जगह फिर उसी आदत को बुला सकती है। वास्तविक जीवन से जुड़ी छोटी गतिविधि उस जगह को अर्थ देती है, चाहे वह सैर हो, खाना बनाने में मदद हो या सामने बैठे व्यक्ति की बात।
कार्यालय में भी उसने हर संदेश पर तुरंत उत्तर देने की आदत देखी। कई संदेश तत्काल नहीं थे, लेकिन उन्हें बीच में देखने से उसका मुख्य काम बार बार टूटता था। उसने सहकर्मियों से बात कर संदेश देखने के कुछ समय तय किए। अत्यावश्यक बात के लिए सीधे फोन का विकल्प रखा। शुरुआत में उसे डर लगा कि लोग लापरवाह समझेंगे। कुछ दिन बाद उसके अधूरे काम घटे। उसने सीखा कि उपलब्ध रहना और हर क्षण बँटा रहना अलग हैं। जब किसी काम पर बैठे हैं तो उसे पूरा ध्यान देना भी दूसरों के प्रति जिम्मेदारी है।
मोबाइल को साधन बनाए रखने के लिए पूछना उपयोगी है कि उसे खोलने से पहले उद्देश्य क्या है। यदि भुगतान करना है तो भुगतान के बाद बंद कीजिए। यदि किसी व्यक्ति से बात करनी है तो बातचीत को अनगिनत पन्नों में मत बदलने दीजिए। अपने जीवन के कुछ स्थान और समय बचाइए, जहाँ सामने मौजूद लोग पहले आएँ। साथ ही आवश्यक काम की वास्तविक जरूरत को समझिए। किसी दूसरे की सीमा की नकल करने के बजाय अपने काम, परिवार और विश्राम के अनुसार व्यवस्था बनाइए। संतुलन कठोर दिखने से नहीं, निभने से बनता है।
पिता की पूरी बात
एक महीने बाद पिता फिर कहीं जाने लगे। उन्होंने कहा, “मैं शर्मा जी के यहाँ जा रहा हूँ।” अनिरुद्ध ने सिर उठाया, समय पूछा और कहा कि लौटते समय वह उन्हें लेने आएगा। बात केवल दो वाक्य की थी। कोई बड़ी घटना नहीं हुई, कोई भाषण नहीं दिया गया। मगर पिता ने जाते समय उसकी आँखों में देखकर मुसकराया। अनिरुद्ध समझ गया कि उसे जिस नियंत्रण की तलाश थी, वह केवल स्क्रीन पर बिताए मिनटों में नहीं था। वह इस क्षमता में था कि कब किस जीवन की ओर अपना ध्यान मोड़ना है।
फोन अब भी उसके काम का हिस्सा था। वह तस्वीरें लेता, रास्ता खोजता, पैसे भेजता और मित्रों से बात करता। कुछ शामों में फिर जरूरत से ज्यादा समय भी चला जाता। लेकिन अब वह उस समय को पहचानता और लौटता था। बैठक की मेज पर एक छोटी टोकरी रखी थी, जहाँ भोजन के समय सब अपने फोन रखते। बेटी ने उसके लिए मजाक में नाम रखा, “फोन का विश्रामघर।” अनिरुद्ध हँस पड़ा। उस छोटे विश्रामघर ने परिवार के बीच ऐसी जगह खोली थी, जिसे लंबे समय से हर चमकती सूचना ने भर रखा था।
अनिरुद्ध को उस शाम पहली बार डर लगा कि उसके पिता सचमुच घर छोड़कर चले गए हैं। दरवाजे के पास उनकी चप्पलें नहीं थीं, कमरे की कुर्सी खाली थी और फोन घर पर रखा था। उसने पड़ोस में पूछा, बाजार की ओर दौड़ा और फिर पत्नी को फोन किया। तभी उसकी छह साल की बेटी ने कहा, “दादाजी ने आपको बताया था।” अनिरुद्ध ठिठक गया। कब बताया था? उसे केवल इतना याद था कि दोपहर में वह बैठक में बैठा था और काम से संबंधित संदेश देख रहा था। पिता उसके पास आए थे, कुछ बोले थे और उसने बिना सिर उठाए हाँ कहा था।
वे पास के पुराने परिचित के घर गए थे। लौटे तो अनिरुद्ध ने राहत के साथ शिकायत भी की। “जाते समय बता तो देते!” पिता ने शांत आवाज में कहा, “बेटा, दो बार बताया था। तुमने कहा था ठीक है।” अनिरुद्ध उत्तर देने लगा कि बहुत जरूरी काम था, फिर बेटी का चेहरा देखकर चुप हो गया। उस शाम उसे याद आया कि स्कूल के कार्यक्रम की तारीख भी वह सुन नहीं पाया था। घर में लोग बोलते थे, उसकी ओर देखते थे, और वह एक छोटे चमकते पर्दे के भीतर किसी दूसरी जगह मौजूद रहता था।
रात में उसने फोन दूर रखा, पर कुछ मिनट बाद हाथ फिर उसी तरफ चला गया। कोई जरूरी संदेश नहीं था। उसने मौसम देखा, फिर समाचार, फिर एक वीडियो। आधा घंटा बीत गया। उसे लगा कि फोन उसके हाथ में है, इसलिए नियंत्रण भी उसी का होगा। लेकिन उसका हाथ कब और क्यों उठ रहा था, इसका उत्तर उसके पास नहीं था। मोबाइल उपयोगी साधन था। काम, भुगतान, रास्ता और दूर बैठे लोगों से बातचीत उसी से होती थी। सवाल उसकी उपयोगिता का नहीं, उस जगह का था जो उसने जीवन में बिना पूछे घेर ली थी।
जरूरी काम की आड़
अगले दिन उसने अपने फोन का उपयोग विवरण देखा। वह आँकड़ा देखकर चौंका, मगर तुरंत कारण भी गिनाने लगा। नौकरी में फोन चाहिए, समूहों में सूचना आती है, खाली समय में थोड़ा मनोरंजन बुरा नहीं। पत्नी ने कहा, “सारा समय गलत नहीं है। पर जरूरी काम समाप्त होने के बाद भी तुम वहीं क्यों रहते हो?” इस सवाल का उत्तर आँकड़े में नहीं था। उसने तय किया कि तीन दिन केवल यह लिखेगा कि फोन किस कारण उठाया और उसके बाद क्या किया। वह कोई कड़ा नियम बनाने से पहले अपनी आदत को पहचानना चाहता था।
पहले दिन सूची में बार बार वही कारण आया, कोई कारण नहीं। चाय बनते समय, लिफ्ट की प्रतीक्षा में, भोजन के बाद, बातचीत के बीच और रात में सोने से पहले उसने फोन खोला था। एक संदेश देखने गया और कई दूसरे पन्ने खोलता रहा। उसने पाया कि छोटे खाली क्षण अब उसे असहज करते हैं। पहले उन्हीं क्षणों में वह आसपास देखता, किसी से बात करता या अपने दिन के बारे में सोचता था। अब हर विराम भरने की वस्तु बन गया था। उसका ध्यान लगातार बुलाया जा रहा था और वह हर बुलावे पर उपस्थित हो जाता था।
तीसरे दिन पिता ने उसके सामने चाय रखी। अनिरुद्ध ने स्क्रीन बंद की और पूछा, “उस मित्र के यहाँ क्या काम था?” पिता ने बताया कि उनका मित्र घर बेचने की सोच रहा है। यह बात पहले भी उन्होंने कही थी, मगर अनिरुद्ध ने नहीं सुनी थी। दस मिनट की बातचीत में उसे एक पूरा जीवन दिखाई दिया, जिसमें पुरानी मित्रता, बीमारी नहीं बल्कि उम्र का अकेलापन, और घर बदलने का कठिन निर्णय था। वह सोचता रहा कि जिनके साथ रहता है, उनकी कहानी से वह कितना अनजान हो गया है। फोन ने बात रोकी नहीं थी; उसने प्राथमिकता बदल दी थी।
पहला नियम और पहली हार
अनिरुद्ध ने उत्साह में तय किया कि अब शाम सात बजे के बाद फोन नहीं छुएगा। दूसरे ही दिन कार्यालय से जरूरी कॉल आया और नियम टूट गया। उसने सोचा कि उसके काम में कोई सीमा संभव नहीं। फिर उसने अंतर समझा। जरूरी कॉल लेने की सुविधा और लगातार हर सूचना देखने की आदत एक ही चीज नहीं हैं। उसने नियम बदला। रात के भोजन पर फोन मेज पर नहीं आएगा। काम का आवश्यक कॉल आ सकता है, लेकिन मनोरंजन और समूह संदेश बाद में देखे जाएँगे। परिवार को भी पता रहेगा कि कब वास्तव में काम है और कब सिर्फ भटकना है।
उसने अनावश्यक सूचनाएँ बंद कीं। जिन लोगों के तत्काल फोन जरूरी थे, उनके लिए रास्ता खुला रखा। सामाजिक मंचों को पहले पृष्ठ से हटाया और सुबह उठते ही देखने के बजाय नाश्ते के बाद निर्धारित समय चुना। फोन रात में तकिए के पास रखने की जगह कमरे की दूसरी मेज पर रखा। ये छोटे परिवर्तन थे। वे उसके संकल्प को आसान बना रहे थे। यदि ध्यान खींचने वाली वस्तु हर समय हाथ की दूरी पर हो तो हर बार इच्छाशक्ति से लड़ना पड़ता है। उपयोग का वातावरण बदलने से कुछ लड़ाइयाँ शुरू होने से पहले ही घट जाती हैं।
पहले सप्ताह में वह कई बार नियम भूल गया। बेटी कहानी सुनाते समय वह अनजाने में फोन उठा चुका था। उसने बहाना करने के बजाय फोन रखकर कहा, “मैं बीच में हट गया था, फिर से सुनाओ।” इससे बेटी की हर बात लंबी और सुंदर नहीं हो गई, पर उसे सुनने वाला व्यक्ति मिला। अनिरुद्ध ने जाना कि सीमा टूटने पर बचाव करने की जरूरत नहीं है। उस क्षण वापस आना ज्यादा उपयोगी है। अपने व्यवहार की गलती स्वीकार करना परिवार को भी यह सिखाता है कि नियम केवल बच्चों के लिए नहीं होते।
खाली जगह का असली उपयोग
फोन कम करने से समय अपने आप अच्छा नहीं हो गया। पहली शाम वह बेचैन होकर कमरे में घूमता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि आधे घंटे में क्या करे। उसने पिता से पुराने घर के बारे में पूछा। अगले दिन बेटी के साथ छत पर गया। फिर एक छोटी पुस्तक शुरू की, जिसे उसने महीनों पहले खरीदा था। विकल्प तैयार करना जरूरी निकला। केवल किसी आदत को रोक देने से बनी खाली जगह फिर उसी आदत को बुला सकती है। वास्तविक जीवन से जुड़ी छोटी गतिविधि उस जगह को अर्थ देती है, चाहे वह सैर हो, खाना बनाने में मदद हो या सामने बैठे व्यक्ति की बात।
कार्यालय में भी उसने हर संदेश पर तुरंत उत्तर देने की आदत देखी। कई संदेश तत्काल नहीं थे, लेकिन उन्हें बीच में देखने से उसका मुख्य काम बार बार टूटता था। उसने सहकर्मियों से बात कर संदेश देखने के कुछ समय तय किए। अत्यावश्यक बात के लिए सीधे फोन का विकल्प रखा। शुरुआत में उसे डर लगा कि लोग लापरवाह समझेंगे। कुछ दिन बाद उसके अधूरे काम घटे। उसने सीखा कि उपलब्ध रहना और हर क्षण बँटा रहना अलग हैं। जब किसी काम पर बैठे हैं तो उसे पूरा ध्यान देना भी दूसरों के प्रति जिम्मेदारी है।
मोबाइल को साधन बनाए रखने के लिए पूछना उपयोगी है कि उसे खोलने से पहले उद्देश्य क्या है। यदि भुगतान करना है तो भुगतान के बाद बंद कीजिए। यदि किसी व्यक्ति से बात करनी है तो बातचीत को अनगिनत पन्नों में मत बदलने दीजिए। अपने जीवन के कुछ स्थान और समय बचाइए, जहाँ सामने मौजूद लोग पहले आएँ। साथ ही आवश्यक काम की वास्तविक जरूरत को समझिए। किसी दूसरे की सीमा की नकल करने के बजाय अपने काम, परिवार और विश्राम के अनुसार व्यवस्था बनाइए। संतुलन कठोर दिखने से नहीं, निभने से बनता है।
पिता की पूरी बात
एक महीने बाद पिता फिर कहीं जाने लगे। उन्होंने कहा, “मैं शर्मा जी के यहाँ जा रहा हूँ।” अनिरुद्ध ने सिर उठाया, समय पूछा और कहा कि लौटते समय वह उन्हें लेने आएगा। बात केवल दो वाक्य की थी। कोई बड़ी घटना नहीं हुई, कोई भाषण नहीं दिया गया। मगर पिता ने जाते समय उसकी आँखों में देखकर मुसकराया। अनिरुद्ध समझ गया कि उसे जिस नियंत्रण की तलाश थी, वह केवल स्क्रीन पर बिताए मिनटों में नहीं था। वह इस क्षमता में था कि कब किस जीवन की ओर अपना ध्यान मोड़ना है।
फोन अब भी उसके काम का हिस्सा था। वह तस्वीरें लेता, रास्ता खोजता, पैसे भेजता और मित्रों से बात करता। कुछ शामों में फिर जरूरत से ज्यादा समय भी चला जाता। लेकिन अब वह उस समय को पहचानता और लौटता था। बैठक की मेज पर एक छोटी टोकरी रखी थी, जहाँ भोजन के समय सब अपने फोन रखते। बेटी ने उसके लिए मजाक में नाम रखा, “फोन का विश्रामघर।” अनिरुद्ध हँस पड़ा। उस छोटे विश्रामघर ने परिवार के बीच ऐसी जगह खोली थी, जिसे लंबे समय से हर चमकती सूचना ने भर रखा था।