माता-पिता बच्चों को सफल बनाने से पहले अच्छा मनुष्य कैसे बनाएँ?
पुरस्कार और गायब पेंसिल
मंजरी ने बेटे का पुरस्कार बैठक की मेज पर रखा था। विद्यालय की प्रतियोगिता में उसका चित्र चुना गया था। घर में सब खुश थे। तभी छोटे भाई ने कहा कि उसकी रंगीन पेंसिलें गायब हैं। बेटे ईशान ने तुरंत कहा कि उसने नहीं लीं। मंजरी ने उसे देखा। पिछले दिन वही पेंसिलें उसकी मेज पर थीं। उसने छोटे बच्चे को शांत कर दिया और पुरस्कार की तस्वीर लेने लगी। लेकिन रात में चित्र का डिब्बा खोलते समय वही पेंसिलें मिलीं। पुरस्कार की चमक के बीच एक छोटी चोरी और उससे जुड़ा झूठ अब सामने पड़ा था।
ईशान ने कहा कि पेंसिलें केवल उधार ली थीं और लौटाना भूल गया। मंजरी ने पूछा कि पूछे बिना लेने और बाद में मना करने की बात क्या थी। वह रोने लगा। “अगर बता देता तो आप प्रतियोगिता में नहीं भेजतीं।” मंजरी चुप रह गई। उसने कई बार गलती होने पर किसी अच्छी गतिविधि को रोकने की धमकी दी थी। बच्चा गलती से बचने के साथ सच बताने से भी बचना सीख रहा था। उसे समझ आया कि अच्छे परिणाम की प्रशंसा करते समय उसने व्यवहार पर उतना ध्यान नहीं दिया था। पुरस्कार महत्वपूर्ण था, लेकिन उसे पाने के रास्ते की जिम्मेदारी भी थी।
उसने पेंसिलें वापस कराईं। ईशान ने छोटे भाई से माफी माँगी और आगे पूछकर लेने का वादा किया। मंजरी ने केवल रोने पर बात समाप्त नहीं की। उन्होंने तय किया कि पेंसिलों की टूटी नोक ठीक करने और सामान व्यवस्थित करने में वह मदद करेगा। गलती का परिणाम उसी व्यवहार से जुड़ा था। चित्र का पुरस्कार छीनकर शर्मिंदा करना जरूरी नहीं था। साथ ही सफलता के कारण गलती छिपाना भी ठीक नहीं था। उस रात मंजरी ने पहली बार सोचा कि वह बेटे को सफल देखना चाहती है, मगर सफलता के भीतर कैसा मनुष्य बन रहा है, यह प्रश्न पीछे छूट रहा था।
अंक से आगे का प्रश्न
अगले सप्ताह परीक्षा का परिणाम आया। ईशान के अंक अच्छे थे। मंजरी ने बधाई दी और फिर पूछा कि परीक्षा में कोई कठिन परिस्थिति आई थी? उसने बताया कि पीछे बैठे बच्चे ने उत्तर माँगा, लेकिन उसने नहीं बताया। मंजरी पहले कह सकती थी कि अच्छा हुआ, कोई तुम्हारे अंक नहीं ले पाएगा। इस बार उसने ईमानदार प्रयास की बात की। सफलता केवल दूसरों से आगे होने का नाम नहीं है। अपने काम को सही ढंग से करना और दूसरे की मदद का उचित समय समझना भी उसमें है। परीक्षा के बाद साथ पढ़ना सहयोग है; परीक्षा के भीतर अनुचित सहायता देना अलग व्यवहार है।
मंजरी ने घर की भाषा देखी। अच्छा मनुष्य कहने के बावजूद तुलना बार बार होती थी। पड़ोसी का बच्चा अधिक अंक लाया, चचेरा भाई प्रतियोगिता जीता, कोई अधिक साफ बोलता है। बच्चे को संदेश मिलता था कि उसकी कीमत क्रम और प्रशंसा पर निर्भर है। उसने तुलना घटाने की कोशिश की और प्रयास, जिम्मेदारी तथा सीखने पर बात की। यह बदलाव हर सफलता को महत्वहीन बनाना नहीं था। अच्छा परिणाम आनंद दे सकता है। लेकिन केवल परिणाम के कारण बच्चे की पूरी पहचान ऊँची या नीची करना उसके व्यवहार में सही निर्णय का आधार कमजोर कर सकता है।
एक रविवार परिवार बाजार गया। दुकानदार से बात करते समय मंजरी नाराज होकर कठोर शब्द बोल गई। घर लौटकर उसने ईशान को सम्मान की सीख दी तो बेटे ने पूछा कि दुकान वाले से ऐसे क्यों बोलीं। मंजरी को बचाव का अवसर मिला था। वह कह सकती थी कि उसने गलती की थी, इसलिए योग्य था। लेकिन उसने माना कि नाराजगी में भी भाषा ठीक होनी चाहिए थी। अगले दिन उसने दुकान पर जाकर बात सुधारी। बच्चे के सामने अपनी गलती स्वीकार करना अधिकार समाप्त नहीं करता। वह दिखाता है कि मूल्य केवल छोटे लोगों के लिए नियम नहीं, सभी के व्यवहार का आधार हैं।
अच्छाई का अभ्यास कहाँ होता है
मंजरी ने ईशान को घर के छोटे काम दिए। पानी भरना, अपना सामान सँभालना और भोजन के बाद मेज साफ करना। पहले वह सोचती थी कि पढ़ाई करने वाले बच्चे को बाकी काम से दूर रखना चाहिए। फिर समझा कि जीवन की जिम्मेदारी केवल पढ़ाई की मेज पर नहीं सीखी जाती। काम अपनी उम्र के अनुसार होना चाहिए और खेल तथा विश्राम की जगह भी रहनी चाहिए। उद्देश्य बच्चे को नौकर बनाना नहीं, परिवार की साझेदारी समझाना था। उसने पाया कि किसी दूसरे का काम कितना लगता है, इसका अनुभव होने पर बच्चा उस श्रम को थोड़ा अधिक सम्मान देने लगा।
एक दिन ईशान के मित्र ने नया महँगा सामान दिखाया। बेटा घर आकर वैसा ही माँगने लगा। मंजरी ने उसे गरीब और अमीर की नैतिक कहानी सुनाने के बजाय जरूरत और घर की क्षमता बताई। कुछ इच्छाएँ प्रतीक्षा कर सकती हैं। उपलब्ध चीज की कदर, पैसे का सही उपयोग और दूसरों की सुविधा देखकर अपने घर को छोटा न मानना भी शिक्षा का हिस्सा था। ईशान तुरंत संतुष्ट नहीं हुआ। उसने नाराजगी दिखाई। मंजरी ने सीमा बनाए रखी, मगर उसे अपमानित नहीं किया। अच्छा व्यवहार सीखना हर भावना गायब करना नहीं है; भावना के साथ उचित सीमा निभाना है।
विद्यालय में एक बच्चे का मजाक बनता था, क्योंकि वह धीमे बोलता था। ईशान ने एक दिन उस बात पर हँसी में हिस्सा लिया। घर में बताने पर मंजरी को दुख हुआ। उसने पूछा कि उस बच्चे को कैसा लगा होगा और अगली बार वह क्या कर सकता है। उन्होंने केवल यह नहीं कहा कि ऐसा मत करना। ईशान ने तय किया कि मजाक में शामिल नहीं होगा और उस बच्चे के साथ काम साझा करेगा। अगली बार यह सरल नहीं था। मित्रों के सामने अलग व्यवहार करना कठिन लगा। फिर भी उसने एक छोटा कदम लिया। मूल्य तभी गहराते हैं जब उन्हें वास्तविक सामाजिक दबाव में अभ्यास मिलता है।
सफलता की सही जगह
माता पिता बच्चे को अच्छा मनुष्य बनाने के लिए रोज के व्यवहार को महत्व दे सकते हैं। सच बताने पर पहले स्थिति समझें, फिर जिम्मेदारी तय करें। गलती छिपाने की आदत को अनदेखा न करें, लेकिन हर सच पर असंगत धमकी देकर उसे कठिन भी न बनाएँ। घर में सम्मान की भाषा स्वयं निभाएँ। उम्र के अनुसार काम और निर्णय दें। जीत पर खुशी मनाएँ, हार पर सीखने की जगह रखें। किसी दूसरे को छोटा करके बच्चे को बड़ा साबित करने से बचें। उसके कौशल और सफलता का रास्ता ऐसा हो, जिसमें ईमानदारी, सहयोग और दूसरे की गरिमा बनी रहे।
मंजरी ने ईशान से एक दिन पूछा कि बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। उसने कई उत्तर दिए, चित्रकार, इंजीनियर, शायद शिक्षक। मंजरी ने सब सुने। फिर पूछा कि जिस काम में जाएगा, वहाँ लोग उस पर क्यों भरोसा करेंगे? ईशान ने पहले कहा कि वह अच्छा काम करेगा। फिर थोड़ा सोचकर जोड़ा कि गलती होगी तो बताएगा। मंजरी को लगा कि यह उत्तर किसी बड़ी उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। पेशे का निर्णय अभी दूर था। भरोसेमंद व्यवहार का अभ्यास आज शुरू हो सकता था। बच्चे की रुचि और क्षमता के साथ उसका चरित्र भी रोज बनता है।
कुछ महीनों बाद नई प्रतियोगिता हुई। ईशान का चित्र इस बार नहीं चुना गया। वह उदास लौट आया, लेकिन पेंसिलें उसने पहले पूछकर ली थीं और लौटाते समय ठीक रखीं। मंजरी ने परिणाम की निराशा सुनी। फिर चित्र देखते हुए कहा कि रंग अच्छे हैं, अगली बार कुछ सुधार कर सकते हैं। उसने ईमानदारी से काम करने की भी कदर की। बैठक की मेज पर पुराना पुरस्कार अब भी था। उसके पास कोई नया पुरस्कार नहीं जुड़ा, मगर घर में एक छोटी बात बदल गई थी। सफलता की तैयारी के साथ सही व्यवहार की तैयारी भी चलने लगी थी।
मंजरी ने बेटे का पुरस्कार बैठक की मेज पर रखा था। विद्यालय की प्रतियोगिता में उसका चित्र चुना गया था। घर में सब खुश थे। तभी छोटे भाई ने कहा कि उसकी रंगीन पेंसिलें गायब हैं। बेटे ईशान ने तुरंत कहा कि उसने नहीं लीं। मंजरी ने उसे देखा। पिछले दिन वही पेंसिलें उसकी मेज पर थीं। उसने छोटे बच्चे को शांत कर दिया और पुरस्कार की तस्वीर लेने लगी। लेकिन रात में चित्र का डिब्बा खोलते समय वही पेंसिलें मिलीं। पुरस्कार की चमक के बीच एक छोटी चोरी और उससे जुड़ा झूठ अब सामने पड़ा था।
ईशान ने कहा कि पेंसिलें केवल उधार ली थीं और लौटाना भूल गया। मंजरी ने पूछा कि पूछे बिना लेने और बाद में मना करने की बात क्या थी। वह रोने लगा। “अगर बता देता तो आप प्रतियोगिता में नहीं भेजतीं।” मंजरी चुप रह गई। उसने कई बार गलती होने पर किसी अच्छी गतिविधि को रोकने की धमकी दी थी। बच्चा गलती से बचने के साथ सच बताने से भी बचना सीख रहा था। उसे समझ आया कि अच्छे परिणाम की प्रशंसा करते समय उसने व्यवहार पर उतना ध्यान नहीं दिया था। पुरस्कार महत्वपूर्ण था, लेकिन उसे पाने के रास्ते की जिम्मेदारी भी थी।
उसने पेंसिलें वापस कराईं। ईशान ने छोटे भाई से माफी माँगी और आगे पूछकर लेने का वादा किया। मंजरी ने केवल रोने पर बात समाप्त नहीं की। उन्होंने तय किया कि पेंसिलों की टूटी नोक ठीक करने और सामान व्यवस्थित करने में वह मदद करेगा। गलती का परिणाम उसी व्यवहार से जुड़ा था। चित्र का पुरस्कार छीनकर शर्मिंदा करना जरूरी नहीं था। साथ ही सफलता के कारण गलती छिपाना भी ठीक नहीं था। उस रात मंजरी ने पहली बार सोचा कि वह बेटे को सफल देखना चाहती है, मगर सफलता के भीतर कैसा मनुष्य बन रहा है, यह प्रश्न पीछे छूट रहा था।
अंक से आगे का प्रश्न
अगले सप्ताह परीक्षा का परिणाम आया। ईशान के अंक अच्छे थे। मंजरी ने बधाई दी और फिर पूछा कि परीक्षा में कोई कठिन परिस्थिति आई थी? उसने बताया कि पीछे बैठे बच्चे ने उत्तर माँगा, लेकिन उसने नहीं बताया। मंजरी पहले कह सकती थी कि अच्छा हुआ, कोई तुम्हारे अंक नहीं ले पाएगा। इस बार उसने ईमानदार प्रयास की बात की। सफलता केवल दूसरों से आगे होने का नाम नहीं है। अपने काम को सही ढंग से करना और दूसरे की मदद का उचित समय समझना भी उसमें है। परीक्षा के बाद साथ पढ़ना सहयोग है; परीक्षा के भीतर अनुचित सहायता देना अलग व्यवहार है।
मंजरी ने घर की भाषा देखी। अच्छा मनुष्य कहने के बावजूद तुलना बार बार होती थी। पड़ोसी का बच्चा अधिक अंक लाया, चचेरा भाई प्रतियोगिता जीता, कोई अधिक साफ बोलता है। बच्चे को संदेश मिलता था कि उसकी कीमत क्रम और प्रशंसा पर निर्भर है। उसने तुलना घटाने की कोशिश की और प्रयास, जिम्मेदारी तथा सीखने पर बात की। यह बदलाव हर सफलता को महत्वहीन बनाना नहीं था। अच्छा परिणाम आनंद दे सकता है। लेकिन केवल परिणाम के कारण बच्चे की पूरी पहचान ऊँची या नीची करना उसके व्यवहार में सही निर्णय का आधार कमजोर कर सकता है।
एक रविवार परिवार बाजार गया। दुकानदार से बात करते समय मंजरी नाराज होकर कठोर शब्द बोल गई। घर लौटकर उसने ईशान को सम्मान की सीख दी तो बेटे ने पूछा कि दुकान वाले से ऐसे क्यों बोलीं। मंजरी को बचाव का अवसर मिला था। वह कह सकती थी कि उसने गलती की थी, इसलिए योग्य था। लेकिन उसने माना कि नाराजगी में भी भाषा ठीक होनी चाहिए थी। अगले दिन उसने दुकान पर जाकर बात सुधारी। बच्चे के सामने अपनी गलती स्वीकार करना अधिकार समाप्त नहीं करता। वह दिखाता है कि मूल्य केवल छोटे लोगों के लिए नियम नहीं, सभी के व्यवहार का आधार हैं।
अच्छाई का अभ्यास कहाँ होता है
मंजरी ने ईशान को घर के छोटे काम दिए। पानी भरना, अपना सामान सँभालना और भोजन के बाद मेज साफ करना। पहले वह सोचती थी कि पढ़ाई करने वाले बच्चे को बाकी काम से दूर रखना चाहिए। फिर समझा कि जीवन की जिम्मेदारी केवल पढ़ाई की मेज पर नहीं सीखी जाती। काम अपनी उम्र के अनुसार होना चाहिए और खेल तथा विश्राम की जगह भी रहनी चाहिए। उद्देश्य बच्चे को नौकर बनाना नहीं, परिवार की साझेदारी समझाना था। उसने पाया कि किसी दूसरे का काम कितना लगता है, इसका अनुभव होने पर बच्चा उस श्रम को थोड़ा अधिक सम्मान देने लगा।
एक दिन ईशान के मित्र ने नया महँगा सामान दिखाया। बेटा घर आकर वैसा ही माँगने लगा। मंजरी ने उसे गरीब और अमीर की नैतिक कहानी सुनाने के बजाय जरूरत और घर की क्षमता बताई। कुछ इच्छाएँ प्रतीक्षा कर सकती हैं। उपलब्ध चीज की कदर, पैसे का सही उपयोग और दूसरों की सुविधा देखकर अपने घर को छोटा न मानना भी शिक्षा का हिस्सा था। ईशान तुरंत संतुष्ट नहीं हुआ। उसने नाराजगी दिखाई। मंजरी ने सीमा बनाए रखी, मगर उसे अपमानित नहीं किया। अच्छा व्यवहार सीखना हर भावना गायब करना नहीं है; भावना के साथ उचित सीमा निभाना है।
विद्यालय में एक बच्चे का मजाक बनता था, क्योंकि वह धीमे बोलता था। ईशान ने एक दिन उस बात पर हँसी में हिस्सा लिया। घर में बताने पर मंजरी को दुख हुआ। उसने पूछा कि उस बच्चे को कैसा लगा होगा और अगली बार वह क्या कर सकता है। उन्होंने केवल यह नहीं कहा कि ऐसा मत करना। ईशान ने तय किया कि मजाक में शामिल नहीं होगा और उस बच्चे के साथ काम साझा करेगा। अगली बार यह सरल नहीं था। मित्रों के सामने अलग व्यवहार करना कठिन लगा। फिर भी उसने एक छोटा कदम लिया। मूल्य तभी गहराते हैं जब उन्हें वास्तविक सामाजिक दबाव में अभ्यास मिलता है।
सफलता की सही जगह
माता पिता बच्चे को अच्छा मनुष्य बनाने के लिए रोज के व्यवहार को महत्व दे सकते हैं। सच बताने पर पहले स्थिति समझें, फिर जिम्मेदारी तय करें। गलती छिपाने की आदत को अनदेखा न करें, लेकिन हर सच पर असंगत धमकी देकर उसे कठिन भी न बनाएँ। घर में सम्मान की भाषा स्वयं निभाएँ। उम्र के अनुसार काम और निर्णय दें। जीत पर खुशी मनाएँ, हार पर सीखने की जगह रखें। किसी दूसरे को छोटा करके बच्चे को बड़ा साबित करने से बचें। उसके कौशल और सफलता का रास्ता ऐसा हो, जिसमें ईमानदारी, सहयोग और दूसरे की गरिमा बनी रहे।
मंजरी ने ईशान से एक दिन पूछा कि बड़ा होकर क्या बनना चाहता है। उसने कई उत्तर दिए, चित्रकार, इंजीनियर, शायद शिक्षक। मंजरी ने सब सुने। फिर पूछा कि जिस काम में जाएगा, वहाँ लोग उस पर क्यों भरोसा करेंगे? ईशान ने पहले कहा कि वह अच्छा काम करेगा। फिर थोड़ा सोचकर जोड़ा कि गलती होगी तो बताएगा। मंजरी को लगा कि यह उत्तर किसी बड़ी उपलब्धि से कम महत्वपूर्ण नहीं है। पेशे का निर्णय अभी दूर था। भरोसेमंद व्यवहार का अभ्यास आज शुरू हो सकता था। बच्चे की रुचि और क्षमता के साथ उसका चरित्र भी रोज बनता है।
कुछ महीनों बाद नई प्रतियोगिता हुई। ईशान का चित्र इस बार नहीं चुना गया। वह उदास लौट आया, लेकिन पेंसिलें उसने पहले पूछकर ली थीं और लौटाते समय ठीक रखीं। मंजरी ने परिणाम की निराशा सुनी। फिर चित्र देखते हुए कहा कि रंग अच्छे हैं, अगली बार कुछ सुधार कर सकते हैं। उसने ईमानदारी से काम करने की भी कदर की। बैठक की मेज पर पुराना पुरस्कार अब भी था। उसके पास कोई नया पुरस्कार नहीं जुड़ा, मगर घर में एक छोटी बात बदल गई थी। सफलता की तैयारी के साथ सही व्यवहार की तैयारी भी चलने लगी थी।