बच्चों में क्रोध और चिड़चिड़ापन क्यों बढ़ रहा है?
टूटा हुआ नीला कप
अर्पिता ने रसोई से आवाज सुनी तो दौड़कर आई। मेज के पास नीला कप टूटा पड़ा था और दस साल का समर दरवाजे पर खड़ा था। उसने कहा कि कप अपने आप गिर गया। अर्पिता ने पूछा तो वह चिल्लाने लगा, “सब मेरी ही गलती होती है!” पिछले कुछ सप्ताह से उसके उत्तर ऐसे ही थे। गृहकार्य की बात हो, भोजन का समय हो या बाहर खेलने की सीमा, छोटी बात पर आवाज ऊँची हो जाती। अर्पिता को लगता था कि बच्चा बिगड़ रहा है। उस दिन वह कठोर दंड देने वाली थी, फिर उसने देखा कि समर की आँखों में क्रोध के साथ आँसू भी थे।
उसने पहले टूटा काँच हटाया और समर को सुरक्षित जगह बैठाया। बात तुरंत हल नहीं हुई। बच्चा कुछ देर गुस्से में रहा। अर्पिता ने कहा कि चिल्लाकर या वस्तु फेंककर बात नहीं होगी, लेकिन वह सुनना चाहती है कि क्या हुआ। थोड़ी देर बाद उसने बताया कि विद्यालय का काम अधूरा है और अगले दिन सबके सामने पूछे जाने का डर है। घर आकर वह आराम करना चाहता था, मगर उसे सीधे काम पर बैठाया गया। कप पानी लेते समय गिरा था। उसने डर से झूठ कहा और फिर बात बढ़ गई। यह कारण कप तोड़ने की जिम्मेदारी नहीं मिटाता था, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया का संदर्भ देता था।
अर्पिता ने उसी शाम निर्णय नहीं लिया कि यही सारी समस्या है। उसने पिछले दिनों की दिनचर्या देखी। विद्यालय से लौटकर ट्यूशन, गृहकार्य, फिर थोड़ी स्क्रीन और देर से सोना। खेलने का समय कई दिन छूट रहा था। घर में बड़े भी तनाव में तेज बोलते थे। उसे लगा कि क्रोध को केवल बच्चे के चरित्र की कमी कह देना आसान है। व्यवहार के पीछे कई साधारण स्थितियाँ हो सकती हैं, थकान, भूख, अधूरा काम, समझ न आना, तुलना या अपनी बात न सुनी जाना। हर बच्चे का कारण अलग हो सकता है। पहले देखना और सुनना जरूरी है।
गुस्सा और व्यवहार अलग हैं
अगले दिन समर लौटते ही फिर चिड़चिड़ा हुआ। अर्पिता ने पुराने ढंग से कहना चाहा कि अभी से मुँह मत बनाओ। उसने रोका और पूछा कि पहले पानी और थोड़ा विश्राम चाहिए? समर ने सिर हिलाया। कुछ देर बाद गृहकार्य सामने रखा गया। एक प्रश्न उसे समझ नहीं आया था। वह मदद माँगने के बजाय कागज धकेल देता था। अर्पिता ने उसे वाक्य दिया, “यह समझ नहीं आ रहा, मदद चाहिए।” समस्या केवल उत्तर देना नहीं थी। उसे अपनी कठिनाई कहने का दूसरा रास्ता चाहिए था। नया वाक्य तुरंत आदत नहीं बना, मगर अभ्यास का आधार मिला।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गुस्सा आना और दूसरों को नुकसान पहुँचाना अलग बातें हैं। समर नाराज हो सकता है, पर मारना, गाली देना या वस्तु फेंकना स्वीकार नहीं होगा। यदि बहुत गुस्सा है तो सुरक्षित जगह थोड़ा विराम ले सकता है, पानी पी सकता है या बड़े के साथ चुप बैठ सकता है। शांत होने के बाद बात होगी और जो नुकसान हुआ है, उसे सुधारा जाएगा। इस तरह भावना को नकारे बिना व्यवहार की सीमा रखी गई। केवल गुस्सा मत करो कहने से बच्चे को तरीका नहीं मिलता। सीमा के साथ वैकल्पिक व्यवहार सिखाना पड़ता है।
अर्पिता को अपने व्यवहार पर भी काम करना था। एक शाम फोन पर बहस के बाद उसने समर को तेज आवाज में बुलाया। बच्चा चौंका और तुरंत चिल्लाकर उत्तर दिया। पहले वह केवल उसकी प्रतिक्रिया देखती थी। इस बार अपनी आवाज भी सुनी। उसने कहा कि उसका बुलाने का तरीका ठीक नहीं था और फिर सामान्य स्वर में बात की। इससे समर की हर गलती उचित नहीं हुई। लेकिन उसे दिखा कि बड़े भी अपने व्यवहार की जिम्मेदारी लेते हैं। यदि घर की भाषा लगातार कठोर हो तो बच्चे को शांत संवाद का अभ्यास कम मिलता है। उदाहरण केवल अच्छी बात कहने से नहीं बनता।
तुलना से बनी छोटी आग
समर का चचेरा भाई पढ़ाई में तेज था। परिवार के लोग अक्सर उसका उदाहरण देते। समर हँसकर टालता, फिर घर में छोटी बात पर चिढ़ जाता। अर्पिता ने पूछा तो उसने कहा कि सब उसे कम समझते हैं। उसने परिवार से तुलना घटाने की बात की। सुधार की आवश्यकता बनी रही, लेकिन दूसरे बच्चे की उपलब्धि को हथियार नहीं बनाया गया। समर के अपने काम में कौन सी कठिनाई है, उस पर ध्यान आया। किसी एक व्यवहार की समस्या बताना उपयोगी हो सकता है। लगातार तुम ऐसे ही हो कहना बच्चे को स्थायी दोष का अनुभव दे सकता है, जिससे वह बचाव और प्रतिरोध में अधिक जाता है।
विद्यालय की शिक्षिका से बात करने पर पता चला कि समर कभी कभी अपनी बात रखने में झिझकता है। घर में वह ज्यादा तेज बोलता था। अर्पिता ने इस अंतर को समझने की कोशिश की। उसने हर घटना का एक सरल नोट रखा, कब हुई, उससे पहले क्या हुआ और शांत होने में क्या मदद मिली। इससे कुछ सामान्य कारण दिखाई दिए। लंबे बिना विराम काम के बाद प्रतिक्रिया अधिक थी। कठिन प्रश्न पर मदद न माँग पाने से भी गुस्सा आता था। यह नोट किसी निदान की जगह नहीं था। वह रोजमर्रा के व्यवहार को अनुमान के बजाय ध्यान से देखने का तरीका था।
दिनचर्या में छोटे परिवर्तन हुए। भोजन और विश्राम के बाद पढ़ाई, बीच में सीमित विराम और खेलने की कुछ निश्चित जगह। स्क्रीन का उपयोग भी पहले से स्पष्ट रखा गया, अचानक छीनने के बजाय समय बताया गया। समर की सारी चिड़चिड़ाहट समाप्त नहीं हुई। कई दिन बहस हुई। लेकिन माता पिता को प्रतिक्रिया के पहले रुकने की कुछ जगह मिली। उन्होंने उचित सीमा पर टिकना सीखा और हर असंतोष को अपना अपमान मानना थोड़ा घटाया। बच्चे को शांत होने का अभ्यास समय के साथ मिला, किसी एक उपदेश से नहीं।
कब सुनना, कब रोकना
बच्चों के क्रोध को समझने के लिए उस क्षण सुरक्षा और सीमा पहले आती है। चोट पहुँचाने वाला व्यवहार रोकिए, शांत स्वर में कम शब्द बोलिए और लंबा समझाना बाद के लिए रखिए। शांत होने पर परिस्थिति सुनिए, भावना का नाम दीजिए और अगली बार का विकल्प तय कीजिए। गलती का सुधार उम्र के अनुसार बच्चे की भागीदारी से हो। बार बार कठिन व्यवहार हो तो विद्यालय और घर दोनों का संदर्भ समझिए। यदि परेशानी लंबे समय तक बनी रहे, दैनिक जीवन बहुत बाधित हो या सुरक्षा का प्रश्न हो तो उचित पेशेवर सहायता लेना उपयोगी हो सकता है। अनुमान लगाकर बच्चे को कोई स्थायी नाम देना समाधान नहीं है।
अर्पिता ने प्रशंसा का ढंग भी बदला। केवल शांत रहने पर अच्छा बच्चा कहने के बजाय विशिष्ट व्यवहार बताया, “तुमने गुस्से में हाथ रोककर मदद माँगी, यह ठीक किया।” इससे समर को पता चला कि कौन सा प्रयास उपयोगी है। कुछ दिन वह सफल रहा, कुछ दिन नहीं। असफल दिन पर पिछले सारे अच्छे प्रयास मिटा नहीं दिए गए। उन्होंने छोटी प्रगति को देखा और अगले अवसर के लिए अभ्यास रखा। बच्चा अपनी भावना को सँभालना सीख रहा था। इस सीख में धैर्य चाहिए, लेकिन धैर्य का अर्थ अनुचित व्यवहार को हर बार अनदेखा करना नहीं है।
एक शाम समर पानी लेने आया और कप की जगह खाली देखी। नीला कप अब नहीं था। उसने माँ से कहा कि उस दिन डर गया था। अर्पिता ने उत्तर दिया कि डर बताएगा तो वे सुनेंगे, लेकिन सच और जिम्मेदारी दोनों जरूरी हैं। अगले दिन उसने अपनी बचत का थोड़ा हिस्सा नए साधारण कप में दिया और बाकी माँ ने जोड़ा। नया कप कोई पुरस्कार या कठोर दंड नहीं था। वह सुधार में भागीदारी का छोटा संकेत था। उस घर में गुस्सा अब भी आता था, लेकिन उसके बाद केवल चीख और शर्म नहीं रह जाती थी। बात, सीमा और वापस संभलने का रास्ता भी बनने लगा था।
अर्पिता ने रसोई से आवाज सुनी तो दौड़कर आई। मेज के पास नीला कप टूटा पड़ा था और दस साल का समर दरवाजे पर खड़ा था। उसने कहा कि कप अपने आप गिर गया। अर्पिता ने पूछा तो वह चिल्लाने लगा, “सब मेरी ही गलती होती है!” पिछले कुछ सप्ताह से उसके उत्तर ऐसे ही थे। गृहकार्य की बात हो, भोजन का समय हो या बाहर खेलने की सीमा, छोटी बात पर आवाज ऊँची हो जाती। अर्पिता को लगता था कि बच्चा बिगड़ रहा है। उस दिन वह कठोर दंड देने वाली थी, फिर उसने देखा कि समर की आँखों में क्रोध के साथ आँसू भी थे।
उसने पहले टूटा काँच हटाया और समर को सुरक्षित जगह बैठाया। बात तुरंत हल नहीं हुई। बच्चा कुछ देर गुस्से में रहा। अर्पिता ने कहा कि चिल्लाकर या वस्तु फेंककर बात नहीं होगी, लेकिन वह सुनना चाहती है कि क्या हुआ। थोड़ी देर बाद उसने बताया कि विद्यालय का काम अधूरा है और अगले दिन सबके सामने पूछे जाने का डर है। घर आकर वह आराम करना चाहता था, मगर उसे सीधे काम पर बैठाया गया। कप पानी लेते समय गिरा था। उसने डर से झूठ कहा और फिर बात बढ़ गई। यह कारण कप तोड़ने की जिम्मेदारी नहीं मिटाता था, लेकिन उसकी प्रतिक्रिया का संदर्भ देता था।
अर्पिता ने उसी शाम निर्णय नहीं लिया कि यही सारी समस्या है। उसने पिछले दिनों की दिनचर्या देखी। विद्यालय से लौटकर ट्यूशन, गृहकार्य, फिर थोड़ी स्क्रीन और देर से सोना। खेलने का समय कई दिन छूट रहा था। घर में बड़े भी तनाव में तेज बोलते थे। उसे लगा कि क्रोध को केवल बच्चे के चरित्र की कमी कह देना आसान है। व्यवहार के पीछे कई साधारण स्थितियाँ हो सकती हैं, थकान, भूख, अधूरा काम, समझ न आना, तुलना या अपनी बात न सुनी जाना। हर बच्चे का कारण अलग हो सकता है। पहले देखना और सुनना जरूरी है।
गुस्सा और व्यवहार अलग हैं
अगले दिन समर लौटते ही फिर चिड़चिड़ा हुआ। अर्पिता ने पुराने ढंग से कहना चाहा कि अभी से मुँह मत बनाओ। उसने रोका और पूछा कि पहले पानी और थोड़ा विश्राम चाहिए? समर ने सिर हिलाया। कुछ देर बाद गृहकार्य सामने रखा गया। एक प्रश्न उसे समझ नहीं आया था। वह मदद माँगने के बजाय कागज धकेल देता था। अर्पिता ने उसे वाक्य दिया, “यह समझ नहीं आ रहा, मदद चाहिए।” समस्या केवल उत्तर देना नहीं थी। उसे अपनी कठिनाई कहने का दूसरा रास्ता चाहिए था। नया वाक्य तुरंत आदत नहीं बना, मगर अभ्यास का आधार मिला।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गुस्सा आना और दूसरों को नुकसान पहुँचाना अलग बातें हैं। समर नाराज हो सकता है, पर मारना, गाली देना या वस्तु फेंकना स्वीकार नहीं होगा। यदि बहुत गुस्सा है तो सुरक्षित जगह थोड़ा विराम ले सकता है, पानी पी सकता है या बड़े के साथ चुप बैठ सकता है। शांत होने के बाद बात होगी और जो नुकसान हुआ है, उसे सुधारा जाएगा। इस तरह भावना को नकारे बिना व्यवहार की सीमा रखी गई। केवल गुस्सा मत करो कहने से बच्चे को तरीका नहीं मिलता। सीमा के साथ वैकल्पिक व्यवहार सिखाना पड़ता है।
अर्पिता को अपने व्यवहार पर भी काम करना था। एक शाम फोन पर बहस के बाद उसने समर को तेज आवाज में बुलाया। बच्चा चौंका और तुरंत चिल्लाकर उत्तर दिया। पहले वह केवल उसकी प्रतिक्रिया देखती थी। इस बार अपनी आवाज भी सुनी। उसने कहा कि उसका बुलाने का तरीका ठीक नहीं था और फिर सामान्य स्वर में बात की। इससे समर की हर गलती उचित नहीं हुई। लेकिन उसे दिखा कि बड़े भी अपने व्यवहार की जिम्मेदारी लेते हैं। यदि घर की भाषा लगातार कठोर हो तो बच्चे को शांत संवाद का अभ्यास कम मिलता है। उदाहरण केवल अच्छी बात कहने से नहीं बनता।
तुलना से बनी छोटी आग
समर का चचेरा भाई पढ़ाई में तेज था। परिवार के लोग अक्सर उसका उदाहरण देते। समर हँसकर टालता, फिर घर में छोटी बात पर चिढ़ जाता। अर्पिता ने पूछा तो उसने कहा कि सब उसे कम समझते हैं। उसने परिवार से तुलना घटाने की बात की। सुधार की आवश्यकता बनी रही, लेकिन दूसरे बच्चे की उपलब्धि को हथियार नहीं बनाया गया। समर के अपने काम में कौन सी कठिनाई है, उस पर ध्यान आया। किसी एक व्यवहार की समस्या बताना उपयोगी हो सकता है। लगातार तुम ऐसे ही हो कहना बच्चे को स्थायी दोष का अनुभव दे सकता है, जिससे वह बचाव और प्रतिरोध में अधिक जाता है।
विद्यालय की शिक्षिका से बात करने पर पता चला कि समर कभी कभी अपनी बात रखने में झिझकता है। घर में वह ज्यादा तेज बोलता था। अर्पिता ने इस अंतर को समझने की कोशिश की। उसने हर घटना का एक सरल नोट रखा, कब हुई, उससे पहले क्या हुआ और शांत होने में क्या मदद मिली। इससे कुछ सामान्य कारण दिखाई दिए। लंबे बिना विराम काम के बाद प्रतिक्रिया अधिक थी। कठिन प्रश्न पर मदद न माँग पाने से भी गुस्सा आता था। यह नोट किसी निदान की जगह नहीं था। वह रोजमर्रा के व्यवहार को अनुमान के बजाय ध्यान से देखने का तरीका था।
दिनचर्या में छोटे परिवर्तन हुए। भोजन और विश्राम के बाद पढ़ाई, बीच में सीमित विराम और खेलने की कुछ निश्चित जगह। स्क्रीन का उपयोग भी पहले से स्पष्ट रखा गया, अचानक छीनने के बजाय समय बताया गया। समर की सारी चिड़चिड़ाहट समाप्त नहीं हुई। कई दिन बहस हुई। लेकिन माता पिता को प्रतिक्रिया के पहले रुकने की कुछ जगह मिली। उन्होंने उचित सीमा पर टिकना सीखा और हर असंतोष को अपना अपमान मानना थोड़ा घटाया। बच्चे को शांत होने का अभ्यास समय के साथ मिला, किसी एक उपदेश से नहीं।
कब सुनना, कब रोकना
बच्चों के क्रोध को समझने के लिए उस क्षण सुरक्षा और सीमा पहले आती है। चोट पहुँचाने वाला व्यवहार रोकिए, शांत स्वर में कम शब्द बोलिए और लंबा समझाना बाद के लिए रखिए। शांत होने पर परिस्थिति सुनिए, भावना का नाम दीजिए और अगली बार का विकल्प तय कीजिए। गलती का सुधार उम्र के अनुसार बच्चे की भागीदारी से हो। बार बार कठिन व्यवहार हो तो विद्यालय और घर दोनों का संदर्भ समझिए। यदि परेशानी लंबे समय तक बनी रहे, दैनिक जीवन बहुत बाधित हो या सुरक्षा का प्रश्न हो तो उचित पेशेवर सहायता लेना उपयोगी हो सकता है। अनुमान लगाकर बच्चे को कोई स्थायी नाम देना समाधान नहीं है।
अर्पिता ने प्रशंसा का ढंग भी बदला। केवल शांत रहने पर अच्छा बच्चा कहने के बजाय विशिष्ट व्यवहार बताया, “तुमने गुस्से में हाथ रोककर मदद माँगी, यह ठीक किया।” इससे समर को पता चला कि कौन सा प्रयास उपयोगी है। कुछ दिन वह सफल रहा, कुछ दिन नहीं। असफल दिन पर पिछले सारे अच्छे प्रयास मिटा नहीं दिए गए। उन्होंने छोटी प्रगति को देखा और अगले अवसर के लिए अभ्यास रखा। बच्चा अपनी भावना को सँभालना सीख रहा था। इस सीख में धैर्य चाहिए, लेकिन धैर्य का अर्थ अनुचित व्यवहार को हर बार अनदेखा करना नहीं है।
एक शाम समर पानी लेने आया और कप की जगह खाली देखी। नीला कप अब नहीं था। उसने माँ से कहा कि उस दिन डर गया था। अर्पिता ने उत्तर दिया कि डर बताएगा तो वे सुनेंगे, लेकिन सच और जिम्मेदारी दोनों जरूरी हैं। अगले दिन उसने अपनी बचत का थोड़ा हिस्सा नए साधारण कप में दिया और बाकी माँ ने जोड़ा। नया कप कोई पुरस्कार या कठोर दंड नहीं था। वह सुधार में भागीदारी का छोटा संकेत था। उस घर में गुस्सा अब भी आता था, लेकिन उसके बाद केवल चीख और शर्म नहीं रह जाती थी। बात, सीमा और वापस संभलने का रास्ता भी बनने लगा था।