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सब हँसे, समीर चुप हो गया: अभिनव का शुक्रवार वाला मजाक

सब हँसे, समीर चुप हो गया: अभिनव का शुक्रवार वाला मजाक

वैदिक प्रेरणा · 2026-10-22

कार्यालय की शुक्रवार वाली बैठक में इस बार किसी गंभीर प्रस्तुति की जगह हल्की बातचीत रखी गई थी। लोग अपने सप्ताह की छोटी घटनाएँ सुना रहे थे। अभिनव ने एक सहकर्मी की नकल की, फिर दूसरी। सब हँसे तो उसने नए सहयोगी समीर के बोलने का ढंग भी दोहराया। समीर मुसकराया और पानी लेने उठ गया। अभिनव को लगा कि कार्यक्रम सफल रहा। उसे अपनी हाजिरजवाबी पर गर्व था। शाम तक उस नकल का छोटा वीडियो समूह में पहुँच गया और उसके नीचे हँसते हुए कई चेहरे बनने लगे।

सोमवार को प्रस्तुति की बारी आई तो समीर ने अपना हिस्सा लिखकर भेज दिया और कहा कि कोई दूसरा पढ़ दे। अभिनव को आश्चर्य हुआ, क्योंकि पिछले सप्ताह वह स्वयं बोलने को तैयार था। उसने पूछा तो समीर ने काम अधिक होने की बात कहकर बातचीत समाप्त कर दी। पास बैठी सहकर्मी श्रेया ने बाद में अभिनव से कहा कि शायद शुक्रवार का मजाक उसे अच्छा नहीं लगा। अभिनव ने तुरंत कहा कि वह तो स्वयं भी हँसा था। श्रेया ने पूछा कि क्या उस समय हँसने के अलावा उसके लिए कोई आसान रास्ता था।

यह प्रश्न अभिनव को चुभा। उसे लगा कि अब सामान्य हँसी पर भी रोक लग जाएगी। वह कई बार अपनी भूलों पर स्वयं हँसता था और चाहता था कि सब सहज रहें। लेकिन देर शाम वीडियो फिर देखकर उसने एक अंतर देखा। अपनी भूल का किस्सा सुनाते समय विषय वह स्वयं चुनता था। समीर के बोलने को नकल का विषय बनाने से पहले उसने उसकी इच्छा नहीं पूछी थी। वीडियो में समीर की मुसकान थी, मगर उसके मन का अर्थ वीडियो से तय नहीं हो सकता था।

अगले दिन उसने समीर से अकेले में पूछा कि क्या उस नकल से परेशानी हुई। समीर ने पहले कहा कि जाने दीजिए। अभिनव ने इस बार अपनी मंशा का लंबा बचाव नहीं किया। उसने कहा कि यदि बात बताना चाहें तो वह सुनेगा। कुछ देर बाद समीर ने बताया कि नए लोगों के बीच बोलने में उसे पहले ही संकोच होता है। शुक्रवार को सबके साथ हँस देना उसे विवाद करने से आसान लगा था। उसके उच्चारण की चर्चा अब हर प्रस्तुति से पहले याद आने लगी थी।

अभिनव ने सीधे कहा कि उसने अनुमति के बिना एक निजी विशेषता को मनोरंजन बना दिया। उसने वीडियो अपने पास से हटाया और समूह में उसे साझा न करने का आग्रह किया। जो प्रतियाँ दूसरों के पास थीं, उन्हें एक घोषणा भर से मिटा देने का दावा वह नहीं कर सकता था। उसने उपलब्ध नियंत्रण जितना था, उतना इस्तेमाल किया। समीर ने उसे सार्वजनिक रूप से अपनी परेशानी समझाने की अनुमति नहीं दी थी। इसलिए उसने समूह में उसकी भावनाओं का विवरण जोड़कर कोई नई चर्चा शुरू नहीं की।

अगली अनौपचारिक बैठक में अभिनव ने अपने घर के एक असफल खाना बनाने के प्रयोग का किस्सा सुनाया। इस बार भी खूब हँसी हुई। उसे लगा कि किसी को संकोच में धकेले बिना भी बातचीत जीवंत रह सकती है। फिर उसने दूसरों को बोलने की जगह दी। श्रेया ने एक यात्रा का किस्सा सुनाया, जिसमें किसी व्यक्ति की बोली या शरीर को हँसी का कारण नहीं बनाया गया था। कमरे का हल्कापन बना रहा। केवल उसके निर्माण का तरीका थोड़ा बदल गया था।

समीर कुछ दिनों बाद फिर अपनी प्रस्तुति देने लगा। अभिनव ने इसे अपने सुधार का प्रमाण बनाकर सबके सामने नहीं बताया। वह ध्यान से सुनता रहा और काम से संबंधित प्रश्न पूछे। दोनों के बीच सहजता तुरंत पूरी नहीं लौटी थी, पर बातचीत का रास्ता खुला था। अभिनव ने उस दिन समझा कि चुप रह जाना और बुरा न लगना एक बात नहीं हैं। अगली बार मजाक सूझने पर उसे केवल यह नहीं देखना था कि कितने लोग हँसेंगे। यह भी देखना था कि उस हँसी का भार किसी एक व्यक्ति को अकेले तो नहीं उठाना पड़ेगा।

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