हर व्यक्ति को प्रसन्न रखने का प्रयास क्यों छोड़ देना चाहिए?
वह रविवार जो सबका था, केवल उसका नहीं
दीपक ने रविवार सुबह का समय अपनी बेटी के विद्यालय की प्रदर्शनी के लिए रखा था। उसने पिछली बार वादा किया था कि इस बार पूरा कार्यक्रम देखेगा। पर शनिवार रात तक उसके फोन में पाँच अलग अनुरोध आ चुके थे। मित्र को गाड़ी चाहिए थी, पड़ोसी को कागज की प्रतियाँ निकलवानी थीं, कार्यालय का सहकर्मी अपना अधूरा काम भेजना चाहता था और एक रिश्तेदार को बाजार ले जाना था। दीपक हर संदेश का उत्तर एक ही शब्द से दे रहा था, “ठीक।” उसे अच्छा लगता था कि लोग उसे भरोसेमंद समझते हैं। फिर बेटी ने पूछा, “कल सच में आओगे न?” वह कुछ क्षण चुप रहा। उसका रविवार दूसरों को दिए छोटे छोटे आश्वासनों में पहले ही बँट चुका था।
सुबह सात बजे मित्र का फोन आया। गाड़ी जल्दी चाहिए थी। दीपक ने चाबी दी और कहा कि दस बजे लौटा देना। आठ बजे पड़ोसी आए, नौ बजे सहकर्मी का संदेश आया कि फाइल तुरंत देख ले। उसने सोचा कि दस मिनट लगेंगे। चालीस मिनट निकल गए। बेटी तैयार खड़ी थी। गाड़ी नहीं लौटी थी। उसने मित्र को फोन किया तो पता चला कि वह शहर से बाहर के बाजार में था। दीपक का स्वर पहली बार तेज हुआ। मित्र बोला, “तुमने बताया ही नहीं कि काम जरूरी है।” दीपक ने जवाब देना चाहा, फिर देखा कि उसने वास्तव में अपनी जरूरत स्पष्ट नहीं की थी।
वे ऑटो से विद्यालय पहुँचे, लेकिन बेटी की प्रस्तुति समाप्त हो गई थी। वह मंच के पीछे अपना मॉडल रख रही थी। उसने शिकायत भी नहीं की। बोली, “अब देख लो।” उस शांत वाक्य में दीपक को सबसे अधिक दुख हुआ। वह दूसरों को निराश न करने की कोशिश में अपने सबसे जरूरी संबंध को निराश कर चुका था। लौटते समय उसने पत्नी से कहा, “सब मेरे ऊपर काम डाल देते हैं।” पत्नी ने पूछा, “तुम कब बताते हो कि अभी नहीं कर सकते?” इस प्रश्न से वह नाराज हुआ, क्योंकि उसे अपनी अच्छाई पर आरोप लगा। फिर भी उत्तर नहीं मिला।
सहमति के पीछे छिपा भय
दीपक ने अगले दिन अपने सप्ताह का हिसाब लिखा। कितने काम उसने इच्छा से किए और कितने केवल इसलिए कि मना करने पर सामने वाला बुरा मानेगा? दूसरी सूची लंबी निकली। उसे लोगों की मदद करना पसंद था, लेकिन कई बार मदद का सुख नहीं, स्वीकार किए जाने का भय निर्णय कर रहा था। यदि वह हर अनुरोध मान ले तो किसी को शिकायत का अवसर नहीं मिलेगा—यह उम्मीद आकर्षक थी। मगर लोग अलग अलग समय पर अलग जरूरतें लेकर आते हैं। सबको हर समय प्रसन्न रखना किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है।
कार्यालय में सहकर्मी रोहित अक्सर शुक्रवार का अधूरा काम दीपक को भेज देता था। इस सप्ताह भी संदेश आया। दीपक ने स्क्रीन देखी और पहली बार तुरंत उत्तर नहीं दिया। उसने अपना काम देखा, बेटी के अगले कार्यक्रम की तिथि देखी और कहा, “आज यह काम नहीं ले पाऊँगा। सोमवार सुबह पंद्रह मिनट विधि समझा सकता हूँ।” रोहित ने केवल “ठीक” लिखा। दीपक को आश्चर्य हुआ। जिस नाराजगी की उसने कल्पना की थी, वह आई ही नहीं। उसके मन का भय कई बार वास्तविक प्रतिक्रिया से बहुत बड़ा था।
एक अन्य मित्र ने सचमुच नाराज होकर कहा, “अब बहुत व्यस्त हो गए हो।” दीपक के भीतर तुरंत सफाई देने की इच्छा उठी। उसने अपने कामों का लंबा विवरण लिखना शुरू किया, फिर मिटा दिया। उसने कहा, “इस सप्ताह समय नहीं है। अगली बार संभव होगा तो बताऊँगा।” दो दिनों तक उसे असुविधा रही। सीमा बनाने पर असुविधा आना यह प्रमाण नहीं कि सीमा गलत है। कई पुराने संबंध हमारे हमेशा उपलब्ध रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं। नई स्पष्टता को स्वीकार करने में समय लग सकता है।
मदद और स्वयं को मिटाना अलग हैं
दीपक ने मदद बंद नहीं की। उसने उसके लिए समय और क्षमता का ध्यान रखा। सप्ताह में दो छोटे समय ऐसे रखे जहाँ वह पड़ोस के जरूरी कागज या तकनीकी काम में सहायता कर सकता था। आपात स्थिति अलग थी। सामान्य अनुरोध के लिए पहले समय पूछा जाता। इससे दूसरों को भी स्पष्टता मिली। पहले वह हाँ कहकर देर करता, फिर अपराधबोध में उलझता। अब कम काम स्वीकार करता, पर निभाता। भरोसेमंद होना हर बार सहमत होना नहीं। जिस बात को स्वीकार किया है, उसे साफ और जिम्मेदारी से पूरा करना भी भरोसा है।
उसने घर में बेटी से माफी माँगी। उसने यह नहीं कहा कि लोग उसे परेशान कर रहे थे। बोला, “मैंने कई काम स्वीकार किए और तुम्हारे समय की रक्षा नहीं की। यह मेरी गलती थी।” बेटी ने पूछा कि अगली बार क्या करेगा। उसने कैलेंडर में कार्यक्रम का समय रखा और उससे पहले कोई नया काम न लेने का निर्णय किया। केवल पछतावा बच्चे को भरोसा नहीं देता। उसे बदली हुई व्यवस्था चाहिए। दीपक ने अपनी भूल का सुधार उसी संबंध में किया जहाँ उसका असर हुआ था।
माँ ने एक दिन कहा कि परिवार में सबके काम आए बिना संबंध कैसे निभेंगे। दीपक ने ध्यान से सुना। उनकी बात में सहयोग का मूल्य था। उसने बताया कि सहयोग और हमेशा उपलब्ध रहने में अंतर है। यदि अपनी थकान, परिवार और काम को लगातार पीछे रखेगा तो अंत में सहायता भी नाराजगी से करेगा। माँ ने देखा कि वह उनके नियमित काम समय से कर रहा था। उन्हें समझ आने लगा कि उसका बदलना उदासीनता नहीं, व्यवस्था है। संबंध में सीमा का कारण सम्मानपूर्वक बताना अक्सर उसके स्वीकार को आसान बनाता है।
अपनी सीमा बोलने का अभ्यास
दीपक ने तीन सरल उत्तर सीखे। “अभी संभव नहीं है।” “इतना हिस्सा कर सकता हूँ।” “इस तारीख को समय है।” इन वाक्यों में झूठा बहाना नहीं था। वह किसी काम को अस्वीकार करने के लिए पहले बीमारी या संकट गढ़ता था। इससे सामने वाला नई तारीख पूछ लेता और वह फिर उलझ जाता। स्पष्ट उत्तर कठिन लगा, लेकिन टिकाऊ था। कभी उचित कारण बताना उपयोगी है। हर बार लंबी सफाई देना जरूरी नहीं। अपने समय की व्यवस्था रखने के लिए व्यक्ति को अदालत में निर्दोष सिद्ध नहीं होना पड़ता।
उसने यह भी देखा कि हर नाराजगी को तुरंत दूर करना संभव नहीं। किसी की इच्छा अधूरी रह सकती है, फिर भी संबंध कायम रह सकता है। स्वस्थ संबंध में दो लोगों की जरूरतें होती हैं। यदि केवल एक का समय मूल्यवान माना जाए तो वह बराबरी नहीं। दूसरों के दुख के प्रति संवेदनशील होना जरूरी है, लेकिन उनकी हर भावना का प्रबंधक बन जाना संभव नहीं। विनम्र असहमति भी सम्मानपूर्ण संबंध का हिस्सा है। मना करते समय अपमान न करें; सामने वाले की प्रतिक्रिया को पूरी तरह नियंत्रित करने का प्रयास भी न करें।
कुछ महीनों बाद दीपक को एक बड़ा पारिवारिक आयोजन सँभालने को कहा गया। उसने पूरी जिम्मेदारी लेने के बजाय दो स्पष्ट काम चुने। बाकी रिश्तेदारों में बाँटे गए। पहले लोग कहते थे कि वही सब कर लेगा। इस बार दूसरों ने भी भाग लिया। उसे पता चला कि उसकी हमेशा की हाँ कई लोगों को अपनी जिम्मेदारी लेने से भी रोकती थी। सहयोग बाँटा गया तो आयोजन ठीक हुआ और दीपक अंतिम दिन थककर चिड़चिड़ा नहीं हुआ। मदद का आनंद फिर दिखाई देने लगा।
सबसे जरूरी हाँ किसके लिए है?
अगली प्रदर्शनी में दीपक समय से पहुँचा। उसने मोबाइल बंद किया। बेटी अपने मॉडल के पास खड़ी थी और उसने गर्व से पूरा प्रयोग समझाया। दीपक ने सवाल पूछे, तस्वीर ली और देर तक साथ रहा। लौटते समय उसका फोन कई संदेशों से भरा था। दुनिया रुकी नहीं थी। कुछ लोग काम किसी और से करवा चुके थे, कुछ प्रतीक्षा कर रहे थे। जिस आपदा का भय उसने बनाया था, वह नहीं आई। एक जरूरी समय की रक्षा करने से अनेक संबंध टूट नहीं गए।
हर व्यक्ति को प्रसन्न रखने की कोशिश हमें अपने निर्णयों से दूर कर सकती है। हम यह भूलने लगते हैं कि किस काम को सचमुच महत्व देते हैं। सहायता, सेवा और उदारता सुंदर गुण हैं। उन्हें टिकाने के लिए विश्राम, सीमा और प्राथमिकता भी चाहिए। दीपक ने लोगों की परवाह छोड़ी नहीं। उसने अपने जीवन में उनका स्थान संतुलित किया। अब उसकी हाँ अधिक सच्ची थी, क्योंकि उसके पीछे छिपी अनिच्छा कम थी। कभी कभी दूसरों को दिया गया सम्मानपूर्ण नहीं अपने परिवार, काम और स्वयं को दी गई सबसे जरूरी हाँ बन जाता है।
दीपक ने रविवार सुबह का समय अपनी बेटी के विद्यालय की प्रदर्शनी के लिए रखा था। उसने पिछली बार वादा किया था कि इस बार पूरा कार्यक्रम देखेगा। पर शनिवार रात तक उसके फोन में पाँच अलग अनुरोध आ चुके थे। मित्र को गाड़ी चाहिए थी, पड़ोसी को कागज की प्रतियाँ निकलवानी थीं, कार्यालय का सहकर्मी अपना अधूरा काम भेजना चाहता था और एक रिश्तेदार को बाजार ले जाना था। दीपक हर संदेश का उत्तर एक ही शब्द से दे रहा था, “ठीक।” उसे अच्छा लगता था कि लोग उसे भरोसेमंद समझते हैं। फिर बेटी ने पूछा, “कल सच में आओगे न?” वह कुछ क्षण चुप रहा। उसका रविवार दूसरों को दिए छोटे छोटे आश्वासनों में पहले ही बँट चुका था।
सुबह सात बजे मित्र का फोन आया। गाड़ी जल्दी चाहिए थी। दीपक ने चाबी दी और कहा कि दस बजे लौटा देना। आठ बजे पड़ोसी आए, नौ बजे सहकर्मी का संदेश आया कि फाइल तुरंत देख ले। उसने सोचा कि दस मिनट लगेंगे। चालीस मिनट निकल गए। बेटी तैयार खड़ी थी। गाड़ी नहीं लौटी थी। उसने मित्र को फोन किया तो पता चला कि वह शहर से बाहर के बाजार में था। दीपक का स्वर पहली बार तेज हुआ। मित्र बोला, “तुमने बताया ही नहीं कि काम जरूरी है।” दीपक ने जवाब देना चाहा, फिर देखा कि उसने वास्तव में अपनी जरूरत स्पष्ट नहीं की थी।
वे ऑटो से विद्यालय पहुँचे, लेकिन बेटी की प्रस्तुति समाप्त हो गई थी। वह मंच के पीछे अपना मॉडल रख रही थी। उसने शिकायत भी नहीं की। बोली, “अब देख लो।” उस शांत वाक्य में दीपक को सबसे अधिक दुख हुआ। वह दूसरों को निराश न करने की कोशिश में अपने सबसे जरूरी संबंध को निराश कर चुका था। लौटते समय उसने पत्नी से कहा, “सब मेरे ऊपर काम डाल देते हैं।” पत्नी ने पूछा, “तुम कब बताते हो कि अभी नहीं कर सकते?” इस प्रश्न से वह नाराज हुआ, क्योंकि उसे अपनी अच्छाई पर आरोप लगा। फिर भी उत्तर नहीं मिला।
सहमति के पीछे छिपा भय
दीपक ने अगले दिन अपने सप्ताह का हिसाब लिखा। कितने काम उसने इच्छा से किए और कितने केवल इसलिए कि मना करने पर सामने वाला बुरा मानेगा? दूसरी सूची लंबी निकली। उसे लोगों की मदद करना पसंद था, लेकिन कई बार मदद का सुख नहीं, स्वीकार किए जाने का भय निर्णय कर रहा था। यदि वह हर अनुरोध मान ले तो किसी को शिकायत का अवसर नहीं मिलेगा—यह उम्मीद आकर्षक थी। मगर लोग अलग अलग समय पर अलग जरूरतें लेकर आते हैं। सबको हर समय प्रसन्न रखना किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है।
कार्यालय में सहकर्मी रोहित अक्सर शुक्रवार का अधूरा काम दीपक को भेज देता था। इस सप्ताह भी संदेश आया। दीपक ने स्क्रीन देखी और पहली बार तुरंत उत्तर नहीं दिया। उसने अपना काम देखा, बेटी के अगले कार्यक्रम की तिथि देखी और कहा, “आज यह काम नहीं ले पाऊँगा। सोमवार सुबह पंद्रह मिनट विधि समझा सकता हूँ।” रोहित ने केवल “ठीक” लिखा। दीपक को आश्चर्य हुआ। जिस नाराजगी की उसने कल्पना की थी, वह आई ही नहीं। उसके मन का भय कई बार वास्तविक प्रतिक्रिया से बहुत बड़ा था।
एक अन्य मित्र ने सचमुच नाराज होकर कहा, “अब बहुत व्यस्त हो गए हो।” दीपक के भीतर तुरंत सफाई देने की इच्छा उठी। उसने अपने कामों का लंबा विवरण लिखना शुरू किया, फिर मिटा दिया। उसने कहा, “इस सप्ताह समय नहीं है। अगली बार संभव होगा तो बताऊँगा।” दो दिनों तक उसे असुविधा रही। सीमा बनाने पर असुविधा आना यह प्रमाण नहीं कि सीमा गलत है। कई पुराने संबंध हमारे हमेशा उपलब्ध रहने के अभ्यस्त हो जाते हैं। नई स्पष्टता को स्वीकार करने में समय लग सकता है।
मदद और स्वयं को मिटाना अलग हैं
दीपक ने मदद बंद नहीं की। उसने उसके लिए समय और क्षमता का ध्यान रखा। सप्ताह में दो छोटे समय ऐसे रखे जहाँ वह पड़ोस के जरूरी कागज या तकनीकी काम में सहायता कर सकता था। आपात स्थिति अलग थी। सामान्य अनुरोध के लिए पहले समय पूछा जाता। इससे दूसरों को भी स्पष्टता मिली। पहले वह हाँ कहकर देर करता, फिर अपराधबोध में उलझता। अब कम काम स्वीकार करता, पर निभाता। भरोसेमंद होना हर बार सहमत होना नहीं। जिस बात को स्वीकार किया है, उसे साफ और जिम्मेदारी से पूरा करना भी भरोसा है।
उसने घर में बेटी से माफी माँगी। उसने यह नहीं कहा कि लोग उसे परेशान कर रहे थे। बोला, “मैंने कई काम स्वीकार किए और तुम्हारे समय की रक्षा नहीं की। यह मेरी गलती थी।” बेटी ने पूछा कि अगली बार क्या करेगा। उसने कैलेंडर में कार्यक्रम का समय रखा और उससे पहले कोई नया काम न लेने का निर्णय किया। केवल पछतावा बच्चे को भरोसा नहीं देता। उसे बदली हुई व्यवस्था चाहिए। दीपक ने अपनी भूल का सुधार उसी संबंध में किया जहाँ उसका असर हुआ था।
माँ ने एक दिन कहा कि परिवार में सबके काम आए बिना संबंध कैसे निभेंगे। दीपक ने ध्यान से सुना। उनकी बात में सहयोग का मूल्य था। उसने बताया कि सहयोग और हमेशा उपलब्ध रहने में अंतर है। यदि अपनी थकान, परिवार और काम को लगातार पीछे रखेगा तो अंत में सहायता भी नाराजगी से करेगा। माँ ने देखा कि वह उनके नियमित काम समय से कर रहा था। उन्हें समझ आने लगा कि उसका बदलना उदासीनता नहीं, व्यवस्था है। संबंध में सीमा का कारण सम्मानपूर्वक बताना अक्सर उसके स्वीकार को आसान बनाता है।
अपनी सीमा बोलने का अभ्यास
दीपक ने तीन सरल उत्तर सीखे। “अभी संभव नहीं है।” “इतना हिस्सा कर सकता हूँ।” “इस तारीख को समय है।” इन वाक्यों में झूठा बहाना नहीं था। वह किसी काम को अस्वीकार करने के लिए पहले बीमारी या संकट गढ़ता था। इससे सामने वाला नई तारीख पूछ लेता और वह फिर उलझ जाता। स्पष्ट उत्तर कठिन लगा, लेकिन टिकाऊ था। कभी उचित कारण बताना उपयोगी है। हर बार लंबी सफाई देना जरूरी नहीं। अपने समय की व्यवस्था रखने के लिए व्यक्ति को अदालत में निर्दोष सिद्ध नहीं होना पड़ता।
उसने यह भी देखा कि हर नाराजगी को तुरंत दूर करना संभव नहीं। किसी की इच्छा अधूरी रह सकती है, फिर भी संबंध कायम रह सकता है। स्वस्थ संबंध में दो लोगों की जरूरतें होती हैं। यदि केवल एक का समय मूल्यवान माना जाए तो वह बराबरी नहीं। दूसरों के दुख के प्रति संवेदनशील होना जरूरी है, लेकिन उनकी हर भावना का प्रबंधक बन जाना संभव नहीं। विनम्र असहमति भी सम्मानपूर्ण संबंध का हिस्सा है। मना करते समय अपमान न करें; सामने वाले की प्रतिक्रिया को पूरी तरह नियंत्रित करने का प्रयास भी न करें।
कुछ महीनों बाद दीपक को एक बड़ा पारिवारिक आयोजन सँभालने को कहा गया। उसने पूरी जिम्मेदारी लेने के बजाय दो स्पष्ट काम चुने। बाकी रिश्तेदारों में बाँटे गए। पहले लोग कहते थे कि वही सब कर लेगा। इस बार दूसरों ने भी भाग लिया। उसे पता चला कि उसकी हमेशा की हाँ कई लोगों को अपनी जिम्मेदारी लेने से भी रोकती थी। सहयोग बाँटा गया तो आयोजन ठीक हुआ और दीपक अंतिम दिन थककर चिड़चिड़ा नहीं हुआ। मदद का आनंद फिर दिखाई देने लगा।
सबसे जरूरी हाँ किसके लिए है?
अगली प्रदर्शनी में दीपक समय से पहुँचा। उसने मोबाइल बंद किया। बेटी अपने मॉडल के पास खड़ी थी और उसने गर्व से पूरा प्रयोग समझाया। दीपक ने सवाल पूछे, तस्वीर ली और देर तक साथ रहा। लौटते समय उसका फोन कई संदेशों से भरा था। दुनिया रुकी नहीं थी। कुछ लोग काम किसी और से करवा चुके थे, कुछ प्रतीक्षा कर रहे थे। जिस आपदा का भय उसने बनाया था, वह नहीं आई। एक जरूरी समय की रक्षा करने से अनेक संबंध टूट नहीं गए।
हर व्यक्ति को प्रसन्न रखने की कोशिश हमें अपने निर्णयों से दूर कर सकती है। हम यह भूलने लगते हैं कि किस काम को सचमुच महत्व देते हैं। सहायता, सेवा और उदारता सुंदर गुण हैं। उन्हें टिकाने के लिए विश्राम, सीमा और प्राथमिकता भी चाहिए। दीपक ने लोगों की परवाह छोड़ी नहीं। उसने अपने जीवन में उनका स्थान संतुलित किया। अब उसकी हाँ अधिक सच्ची थी, क्योंकि उसके पीछे छिपी अनिच्छा कम थी। कभी कभी दूसरों को दिया गया सम्मानपूर्ण नहीं अपने परिवार, काम और स्वयं को दी गई सबसे जरूरी हाँ बन जाता है।