नक्शे पर हल्दी का निशान: रेवती की मेज का अपना स्थान
नक्शे की शीट पर हल्दी का छोटा निशान देखकर सत्रह वर्ष की रेवती रो पड़ी। माँ ने जल्दी में खाने का डिब्बा उसकी मेज पर रख दिया था। कमरा छोटा था और घर में हर खाली सतह कुछ देर में किसी दूसरे काम की जगह बन जाती थी। रेवती ने कहा कि उसकी चीजों को कोई अपना सामान नहीं समझता। माँ को लगा कि एक निशान के लिए बहुत बड़ी बात कही जा रही है। उन्होंने जवाब दिया कि पढ़ने के लिए पूरी मेज दे रखी है, फिर भी शिकायत है। दोनों ने उस शाम एक दूसरे की बात ठीक से नहीं सुनी।
अगले दिन रेवती की माँ वंदना ने मेज देखी। उस पर सिलाई का डिब्बा, लौटाने वाली किताबें और बिजली की रसीदें भी थीं। रेवती अपनी किताबें खोलती तो पहले इन चीजों को हटाती। बाद में कोई सामान खोजता तो वही ढेर फिर मेज पर आ जाता। वंदना को याद आया कि पिछले सप्ताह उन्होंने खुद कहा था कि अभी यहीं रख दो। उन्हें बेटी की शिकायत पहली बार किसी खास परेशानी से जुड़ी दिखाई दी। मेज दे देने और उसे पढ़ाई के लिए उपलब्ध रहने देने में फर्क था।
रेवती स्कूल से लौटी तो वंदना ने उससे बात शुरू की। उन्होंने उस दिन के डिब्बे के लिए खेद जताया और पूछा कि मेज की कौन सी व्यवस्था काम आएगी। रेवती ने पहले अलग कमरा माँग लिया। घर में उसका तुरंत होना संभव नहीं था। वंदना ने असंभव वादा नहीं किया। उन्होंने साफ कहा कि कमरा अभी नहीं बढ़ेगा, पर यह देखने की गुंजाइश है कि उपलब्ध जगह पर उसका काम बार बार क्यों हटाना पड़ता है। इस बार बात सुविधा की वास्तविक सीमा से शुरू हुई, शिकायत को नखरा मानकर बंद नहीं किया गया।
दोनों ने सामान अलग किया। सिलाई का डिब्बा दूसरी अलमारी में गया और रसीदों के लिए छोटी फाइल बनी। रेवती ने भी माना कि पिछले महीने के बेकार पन्ने उसकी ओर से जमा थे। उसने उन्हें छाँट दिया। मेज के ऊपर एक खुला खाना उसकी चालू परियोजना के लिए रखा गया। घर के बाकी लोगों को बताया गया कि वहाँ रखी चीज उठाने से पहले पूछें। यह नियम केवल बेटी के लिए विशेष सम्मान नहीं था। वंदना के सिलाई वाले हिस्से और पिता की काम वाली फाइल पर भी बिना पूछे सामान रखने की आदत देखी गई।
कुछ दिन व्यवस्था ठीक चली। फिर मेहमान आने पर कमरे में अतिरिक्त बिस्तर लगा और रेवती को अपना काम समेटना पड़ा। उसे लगा कि पुरानी बात फिर शुरू हो गई। इस बार घर वालों ने पहले समय बताया कि जगह कितने दिन साझा करनी होगी और पढ़ने का दूसरा स्थान कहाँ बन सकता है। रेवती पूरी तरह खुश नहीं हुई, लेकिन फर्क समझ सकी। उसकी मेज किसी भी क्षण बिना जानकारी के खाली करा देने वाली जगह नहीं थी। साझा जरूरत थी, इसलिए उससे बात की जा रही थी और उसके काम की अवधि का भी ध्यान रखा जा रहा था।
एक शाम पिता ने उसकी खुली कॉपी उठाकर पढ़नी शुरू की। उसमें पढ़ाई के बीच लिखा निजी नोट था। रेवती ने कॉपी वापस माँगी। पिता को लगा कि वह कुछ छिपा रही है। वंदना ने बात को तुरंत आरोप में बदलने से रोका। परिवार में जरूरी सुरक्षा और पढ़ाई की बातचीत रह सकती थी, मगर हर निजी वाक्य को बिना पूछे पढ़ना उसी बातचीत का विकल्प नहीं था। पिता ने कॉपी रख दी। बाद में रेवती ने परियोजना दिखाई और उसके बारे में खुशी से बताया। उस दिन अपना काम साझा करना उसने स्वयं चुना था।
मेज की व्यवस्था से रेवती की सारी पढ़ाई आसान नहीं हो गई। कभी वह काम टालती थी, कभी किताब खोजती रहती थी और कभी देर तक चित्र बनाती थी। वंदना ने इसे इस तरह नहीं देखा कि जगह मिल गई तो अब हर दिन पूरा परिणाम दिखना चाहिए। सुविधा और जिम्मेदारी दोनों पर बात होती रही। रेवती अपने हिस्से का सामान सँभालती और जरूरत पड़ने पर साझा जगह खाली भी करती। घर में पहली बार उसके काम को केवल बिखरी कॉपियों का ढेर नहीं समझा जा रहा था।
हल्दी वाला निशान शीट के एक किनारे पर रह गया। रेवती ने नया नक्शा बनाया, पर पुरानी शीट तुरंत नहीं फेंकी। उसे देखकर वंदना को अपनी पहली नाराजगी याद आती थी। अब उन्हें लगता था कि बेटी ने केवल बड़ा फर्नीचर नहीं माँगा था। वह चाहती थी कि उसके अधूरे काम, उसके समय और उसकी निजी बात का भी स्थान हो। छोटा घर उतना ही रहा, पर पूछकर चीज रखने की आदत ने उसमें सबके लिए थोड़ी अधिक जगह बना दी।
अगले दिन रेवती की माँ वंदना ने मेज देखी। उस पर सिलाई का डिब्बा, लौटाने वाली किताबें और बिजली की रसीदें भी थीं। रेवती अपनी किताबें खोलती तो पहले इन चीजों को हटाती। बाद में कोई सामान खोजता तो वही ढेर फिर मेज पर आ जाता। वंदना को याद आया कि पिछले सप्ताह उन्होंने खुद कहा था कि अभी यहीं रख दो। उन्हें बेटी की शिकायत पहली बार किसी खास परेशानी से जुड़ी दिखाई दी। मेज दे देने और उसे पढ़ाई के लिए उपलब्ध रहने देने में फर्क था।
रेवती स्कूल से लौटी तो वंदना ने उससे बात शुरू की। उन्होंने उस दिन के डिब्बे के लिए खेद जताया और पूछा कि मेज की कौन सी व्यवस्था काम आएगी। रेवती ने पहले अलग कमरा माँग लिया। घर में उसका तुरंत होना संभव नहीं था। वंदना ने असंभव वादा नहीं किया। उन्होंने साफ कहा कि कमरा अभी नहीं बढ़ेगा, पर यह देखने की गुंजाइश है कि उपलब्ध जगह पर उसका काम बार बार क्यों हटाना पड़ता है। इस बार बात सुविधा की वास्तविक सीमा से शुरू हुई, शिकायत को नखरा मानकर बंद नहीं किया गया।
दोनों ने सामान अलग किया। सिलाई का डिब्बा दूसरी अलमारी में गया और रसीदों के लिए छोटी फाइल बनी। रेवती ने भी माना कि पिछले महीने के बेकार पन्ने उसकी ओर से जमा थे। उसने उन्हें छाँट दिया। मेज के ऊपर एक खुला खाना उसकी चालू परियोजना के लिए रखा गया। घर के बाकी लोगों को बताया गया कि वहाँ रखी चीज उठाने से पहले पूछें। यह नियम केवल बेटी के लिए विशेष सम्मान नहीं था। वंदना के सिलाई वाले हिस्से और पिता की काम वाली फाइल पर भी बिना पूछे सामान रखने की आदत देखी गई।
कुछ दिन व्यवस्था ठीक चली। फिर मेहमान आने पर कमरे में अतिरिक्त बिस्तर लगा और रेवती को अपना काम समेटना पड़ा। उसे लगा कि पुरानी बात फिर शुरू हो गई। इस बार घर वालों ने पहले समय बताया कि जगह कितने दिन साझा करनी होगी और पढ़ने का दूसरा स्थान कहाँ बन सकता है। रेवती पूरी तरह खुश नहीं हुई, लेकिन फर्क समझ सकी। उसकी मेज किसी भी क्षण बिना जानकारी के खाली करा देने वाली जगह नहीं थी। साझा जरूरत थी, इसलिए उससे बात की जा रही थी और उसके काम की अवधि का भी ध्यान रखा जा रहा था।
एक शाम पिता ने उसकी खुली कॉपी उठाकर पढ़नी शुरू की। उसमें पढ़ाई के बीच लिखा निजी नोट था। रेवती ने कॉपी वापस माँगी। पिता को लगा कि वह कुछ छिपा रही है। वंदना ने बात को तुरंत आरोप में बदलने से रोका। परिवार में जरूरी सुरक्षा और पढ़ाई की बातचीत रह सकती थी, मगर हर निजी वाक्य को बिना पूछे पढ़ना उसी बातचीत का विकल्प नहीं था। पिता ने कॉपी रख दी। बाद में रेवती ने परियोजना दिखाई और उसके बारे में खुशी से बताया। उस दिन अपना काम साझा करना उसने स्वयं चुना था।
मेज की व्यवस्था से रेवती की सारी पढ़ाई आसान नहीं हो गई। कभी वह काम टालती थी, कभी किताब खोजती रहती थी और कभी देर तक चित्र बनाती थी। वंदना ने इसे इस तरह नहीं देखा कि जगह मिल गई तो अब हर दिन पूरा परिणाम दिखना चाहिए। सुविधा और जिम्मेदारी दोनों पर बात होती रही। रेवती अपने हिस्से का सामान सँभालती और जरूरत पड़ने पर साझा जगह खाली भी करती। घर में पहली बार उसके काम को केवल बिखरी कॉपियों का ढेर नहीं समझा जा रहा था।
हल्दी वाला निशान शीट के एक किनारे पर रह गया। रेवती ने नया नक्शा बनाया, पर पुरानी शीट तुरंत नहीं फेंकी। उसे देखकर वंदना को अपनी पहली नाराजगी याद आती थी। अब उन्हें लगता था कि बेटी ने केवल बड़ा फर्नीचर नहीं माँगा था। वह चाहती थी कि उसके अधूरे काम, उसके समय और उसकी निजी बात का भी स्थान हो। छोटा घर उतना ही रहा, पर पूछकर चीज रखने की आदत ने उसमें सबके लिए थोड़ी अधिक जगह बना दी।