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गलती स्वीकारने वाला प्रबंधक: जिम्मेदारी का सही नाम

गलती स्वीकारने वाला प्रबंधक: जिम्मेदारी का सही नाम

वैदिक प्रेरणा · 2026-10-22

ग्राहक के सामने खड़े होकर मैंने कहा कि हमारी टीम से तारीख समझने में गलती हुई है। वाक्य बोलते समय मुझे मालूम था कि गलती टीम की नहीं, मेरी थी। मैंने आदेश की पुष्टि बिना पढ़े कर दी थी। अब छह परदे तैयार थे, पर ग्राहक को आठ चाहिए थे। मेरे पीछे खड़ी सहायक शालिनी ने सिर नीचे कर लिया। वह उस सुबह से कह रही थी कि मूल पर्ची दोबारा देख लें।

मैं राघव हूँ और घर की सजावट का एक छोटा कार्यकक्ष चलाता हूँ। दो कारीगर और एक सहायक मेरे साथ काम करते हैं। उस दिन ग्राहक नाराज था। उसके घर समारोह था और अधूरे परदों से परेशानी बढ़ी थी। मैं चाहता था कि उसकी नाराजगी जल्दी शांत हो जाए। अपनी गलती को टीम की अस्पष्ट चूक कह देना उस क्षण आसान लगा। लेकिन शालिनी का झुका सिर देखकर समझ आया कि आसान रास्ते का भार किसी और पर रख दिया गया है।

ग्राहक के जाने के बाद मैंने पर्ची उठाई। संख्या साफ लिखी थी। शालिनी ने उसकी तस्वीर पहले ही साझा की थी। मैंने जल्दी में पुराने आदेश की मात्रा मान ली थी। कोई जटिल रहस्य नहीं था। फिर भी मन में बहाने बन रहे थे कि उस दिन काम बहुत था, फोन लगातार आ रहे थे और सबको थोड़ा ध्यान देना चाहिए था। इनमें कुछ बातें सच थीं, लेकिन वे उस विशिष्ट निर्णय की जिम्मेदारी नहीं बदलती थीं जो मैंने लिया था।

दोपहर में मैंने ग्राहक को फोन किया। संख्या की पुष्टि में अपनी गलती बताई और बचा काम कब तक हो सकता है, यह स्पष्ट किया। मैंने ऐसा समय नहीं दिया जिसे पूरा करने के लिए कारीगरों को चुपचाप पूरी रात काम करना पड़े। पहले उनसे उपलब्धता पूछी। एक जरूरी काम के कारण समय सीमित था। हमने वैकल्पिक व्यवस्था बताई। ग्राहक पूरी तरह खुश नहीं हुआ, मगर उसे वास्तविक स्थिति मिल गई। मैंने घटे हुए भुगतान को स्वीकार किया।

इसके बाद शालिनी और दोनों कारीगरों को बुलाया। मेरी पहली इच्छा थी कि जल्दी से क्षमा माँगकर मामला समाप्त कर दूँ। पर शालिनी ने कहा कि ग्राहक के सामने उसे गलत लगा था, क्योंकि उसने संख्या बताई थी। मैंने उसकी बात बीच में नहीं काटी। उसने कोई कठोर शब्द नहीं कहा। फिर भी उसे सुनना असुविधाजनक था। मैं अपने को न्यायपूर्ण प्रबंधक मानता था। उस दिन मेरे व्यवहार ने उस छवि का साथ नहीं दिया था।

हमने आदेश लेने की प्रक्रिया देखी। हर संख्या पर तीन हस्ताक्षर कराने जैसा बोझिल नियम नहीं बनाया। जो व्यक्ति ग्राहक से पुष्टि करे, वह मात्रा और अंतिम तारीख साफ दर्ज करे। कोई दूसरा अंतर देखे तो उसे पूछने का अधिकार हो। खासकर मेरी बात पर प्रश्न उठाना असम्मान नहीं माना जाएगा। यह आखिरी बात मैंने अलग से कही। नियम तभी उपयोगी हो सकता था जब वरिष्ठ की जल्दबाजी के सामने भी उसका प्रयोग संभव हो।

अगले सप्ताह एक कारीगर ने मेरे बताए माप पर प्रश्न किया। क्षण भर को पुरानी झुँझलाहट लौटी। मुझे लगा मैंने इतना अनुभव किसलिए कमाया है। फिर परदों वाली घटना याद आई। हमने साथ माप देखा। इस बार मेरा माप सही था, लेकिन प्रश्न पूछना फिर भी गलत नहीं था। मैंने उसे धन्यवाद कहा। यदि हर सवाल केवल तब स्वीकार हो जब वह वरिष्ठ को गलत सिद्ध करे, तो लोग सवाल पूछने से पहले भी डरेंगे।

विश्वास तुरंत वापस नहीं आया। शालिनी कुछ दिनों तक हर बात लिखकर देती रही और जवाब मिलने तक आगे नहीं बढ़ती थी। पहले मुझे यह अनावश्यक सावधानी लगी। फिर समझ आया कि पिछले व्यवहार का प्रभाव मिटने में समय लग सकता है। मैंने उससे सामान्य होने की माँग नहीं की। अपने हिस्से की पुष्टि समय पर करता रहा। धीरे धीरे काम की बातचीत सहज हुई। उस सहजता का मूल्य मेरी एक सार्वजनिक माफी से अधिक रोज के व्यवहार में था।

अब जब कोई आदेश बिगड़ता है, मैं पहले पूछता हूँ कि वास्तव में किस निर्णय पर क्या हुआ। उद्देश्य किसी को निर्दोष साबित करना नहीं, जिम्मेदारी सही जगह रखना है। नेतृत्व मेरे लिए केवल अंतिम शब्द बोलने का नाम नहीं रहा। कभी उसमें अपना पहले कहा वाक्य सुधारना भी आता है। उस दिन मैंने टीम कहकर स्वयं को बचाया था। बाद में अपनी गलती स्वीकार की तो पहली बार लगा कि टीम के साथ खड़ा होना वास्तव में किसे कहते हैं।

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