दादी की नई पुस्तक: सीखने की मेज पर उम्र की जगह जिज्ञासा बैठी
घर के आँगन में दादी की कुर्सी हमेशा एक ही जगह रहती थी। सुबह अखबार, दोपहर थोड़ी बातचीत और शाम को पौधों की देखभाल। एक रविवार पोती अवनि संस्कृत की पुस्तक लेकर वहाँ बैठी। दादी ने चित्र देखा और पूछा कि इसमें क्या पढ़ती हो। अवनि ने पाठ का छोटा अर्थ बताया। दादी ने पुस्तक अपने पास खींच ली और बोलीं कि कुछ मुझे भी पढ़ाओ।
अवनि उत्साहित हुई। उसने तुरंत कई पन्ने खोल दिए। अक्षर, शब्द और अभ्यास एक साथ समझाने लगी। दस मिनट बाद दादी ने चश्मा उतार दिया। अवनि को लगा कि शायद मन बदल गया। दादी ने कहा कि सीखना चाहती हूँ, लेकिन इतनी जल्दी में सब कैसे समझूँ। पुस्तक का छोटा छपा भाग भी पढ़ने में कठिन लग रहा था। उत्साह और सुविधा अलग बातें थीं।
अगले दिन अवनि ने केवल एक छोटी पंक्ति चुनी। बड़े अक्षरों में अलग कागज पर लिखा। पहले पूछा कि रोशनी ठीक है या कुर्सी बदलनी है। दादी ने मेज खिसकवाई और पाठ सुना। जहाँ अर्थ नहीं समझा, वहीं रोका। अवनि पहली बार समझ रही थी कि सामने बैठा व्यक्ति उसका पाठ सुनने वाला नहीं, अपनी जरूरत वाला विद्यार्थी है।
घर में किसी ने मजाक किया कि अब इस उम्र में परीक्षा देनी है क्या। दादी हँसीं, पर बाद में पुस्तक बंद कर दी। अवनि ने पूछा तो उन्होंने कहा कि शौक को भी कभी-कभी सफाई देनी पड़ती है। अगले दिन उसने परिवार से सरल बात कही कि दादी अपनी रुचि से पढ़ रही हैं। हर नए काम का कोई प्रमाणपत्र वाला लक्ष्य होना जरूरी नहीं।
अब पढ़ाई का समय दादी तय करतीं। कभी दस मिनट होते, कभी मेहमान आने पर उस दिन नहीं बैठ पातीं। अवनि ने अनुपस्थित रहने की सूची नहीं बनाई। उसने पूछा कि पिछली बात फिर देखें या नया हिस्सा लें। दादी ने भी अपनी पसंद खुलकर बतानी शुरू की। पढ़ाई साथ का समय बन रही थी, लेकिन उससे घर के बाकी कामों का मूल्य कम नहीं किया गया।
एक दिन दादी ने पुराने किसी शब्द का अर्थ बताया। अवनि उसे अंतिम उत्तर मानने लगी, फिर दोनों ने पाठ में अलग प्रयोग देखा। उन्होंने अध्यापिका से पूछा। स्पष्ट हुआ कि इस प्रसंग में बात दूसरी थी। दादी ने सहजता से अपना अनुमान बदला। अवनि को यह सीखना भी मिला कि बड़े होने से हर उत्तर अपने आप सही नहीं हो जाता।
कुछ बातें दादी जल्दी याद रखतीं, कुछ बार-बार पूछतीं। अवनि कभी अधीर होती तो उसे अपनी पहली कक्षाएँ याद आतीं। उसने रुककर अपनी गति धीमी की। दादी ने भी कहा कि यदि किसी दिन थकी हो तो कल पढ़ेंगे। रिश्ते में शिक्षक और विद्यार्थी की नई भूमिका आई थी, पर दोनों की सहजता बची रही। सहायता को आदेश बनने से रोकना जरूरी था।
पड़ोस की महिला ने दादी से कहा कि उन्हें भी पुस्तक देखनी है। दादी ने खुशी से बुलाया, लेकिन स्वयं को अध्यापिका नहीं बताया। जो पढ़ा था उसका अनुभव साझा किया और कठिन प्रश्न साथ रखने को कहा। तीनों ने तय किया कि जिसे स्पष्ट न हो, उसे पुस्तक या जानकार शिक्षक से पूछेंगे। छोटी शुरुआत ने बड़ी विद्वत्ता का दावा नहीं किया।
महीने के अंत में अवनि ने दादी की रिकॉर्डिंग करने का सुझाव दिया। दादी ने मना किया। उन्हें कैमरे के सामने सहज नहीं लगता था। अवनि ने बिना मनाए कॉपी बंद कर दी। सीखने का आनंद परिवार में बाँटना और किसी की आवाज या तस्वीर साझा करना अलग निर्णय हैं। दादी को पढ़ने के लिए प्रदर्शन की सहमति नहीं देनी थी।
वर्षा की शाम आँगन में नहीं बैठ सके तो दोनों खिड़की के पास आ गईं। दादी ने अपनी पसंद का पुराना अभ्यास फिर पढ़ा। अवनि ने कहा कि नया भाग भी कर सकती हैं। दादी बोलीं कि आज इसी को आराम से समझना है। अब पाठ की गति कम होने पर किसी को हार जैसा नहीं लगता था। उनकी पढ़ाई का आकार उनकी रुचि से बन रहा था।
कुछ महीने बाद पुस्तक में बहुत सारे पन्ने अभी बाकी थे। दादी ने उसे अधूरा काम कहकर अलग नहीं रखा। वह ऐसी चीज थी जिसमें लौटने का मन होता था। अवनि के लिए भी यह केवल दादी को अक्षर सिखाने की कहानी नहीं रही। उसने सुनना, सुविधा पूछना और दूसरे के लक्ष्य को अपने उत्साह से अलग पहचानना सीखा। सीखने की मेज पर दोनों कुछ नया पा रही थीं।
अवनि उत्साहित हुई। उसने तुरंत कई पन्ने खोल दिए। अक्षर, शब्द और अभ्यास एक साथ समझाने लगी। दस मिनट बाद दादी ने चश्मा उतार दिया। अवनि को लगा कि शायद मन बदल गया। दादी ने कहा कि सीखना चाहती हूँ, लेकिन इतनी जल्दी में सब कैसे समझूँ। पुस्तक का छोटा छपा भाग भी पढ़ने में कठिन लग रहा था। उत्साह और सुविधा अलग बातें थीं।
अगले दिन अवनि ने केवल एक छोटी पंक्ति चुनी। बड़े अक्षरों में अलग कागज पर लिखा। पहले पूछा कि रोशनी ठीक है या कुर्सी बदलनी है। दादी ने मेज खिसकवाई और पाठ सुना। जहाँ अर्थ नहीं समझा, वहीं रोका। अवनि पहली बार समझ रही थी कि सामने बैठा व्यक्ति उसका पाठ सुनने वाला नहीं, अपनी जरूरत वाला विद्यार्थी है।
घर में किसी ने मजाक किया कि अब इस उम्र में परीक्षा देनी है क्या। दादी हँसीं, पर बाद में पुस्तक बंद कर दी। अवनि ने पूछा तो उन्होंने कहा कि शौक को भी कभी-कभी सफाई देनी पड़ती है। अगले दिन उसने परिवार से सरल बात कही कि दादी अपनी रुचि से पढ़ रही हैं। हर नए काम का कोई प्रमाणपत्र वाला लक्ष्य होना जरूरी नहीं।
अब पढ़ाई का समय दादी तय करतीं। कभी दस मिनट होते, कभी मेहमान आने पर उस दिन नहीं बैठ पातीं। अवनि ने अनुपस्थित रहने की सूची नहीं बनाई। उसने पूछा कि पिछली बात फिर देखें या नया हिस्सा लें। दादी ने भी अपनी पसंद खुलकर बतानी शुरू की। पढ़ाई साथ का समय बन रही थी, लेकिन उससे घर के बाकी कामों का मूल्य कम नहीं किया गया।
एक दिन दादी ने पुराने किसी शब्द का अर्थ बताया। अवनि उसे अंतिम उत्तर मानने लगी, फिर दोनों ने पाठ में अलग प्रयोग देखा। उन्होंने अध्यापिका से पूछा। स्पष्ट हुआ कि इस प्रसंग में बात दूसरी थी। दादी ने सहजता से अपना अनुमान बदला। अवनि को यह सीखना भी मिला कि बड़े होने से हर उत्तर अपने आप सही नहीं हो जाता।
कुछ बातें दादी जल्दी याद रखतीं, कुछ बार-बार पूछतीं। अवनि कभी अधीर होती तो उसे अपनी पहली कक्षाएँ याद आतीं। उसने रुककर अपनी गति धीमी की। दादी ने भी कहा कि यदि किसी दिन थकी हो तो कल पढ़ेंगे। रिश्ते में शिक्षक और विद्यार्थी की नई भूमिका आई थी, पर दोनों की सहजता बची रही। सहायता को आदेश बनने से रोकना जरूरी था।
पड़ोस की महिला ने दादी से कहा कि उन्हें भी पुस्तक देखनी है। दादी ने खुशी से बुलाया, लेकिन स्वयं को अध्यापिका नहीं बताया। जो पढ़ा था उसका अनुभव साझा किया और कठिन प्रश्न साथ रखने को कहा। तीनों ने तय किया कि जिसे स्पष्ट न हो, उसे पुस्तक या जानकार शिक्षक से पूछेंगे। छोटी शुरुआत ने बड़ी विद्वत्ता का दावा नहीं किया।
महीने के अंत में अवनि ने दादी की रिकॉर्डिंग करने का सुझाव दिया। दादी ने मना किया। उन्हें कैमरे के सामने सहज नहीं लगता था। अवनि ने बिना मनाए कॉपी बंद कर दी। सीखने का आनंद परिवार में बाँटना और किसी की आवाज या तस्वीर साझा करना अलग निर्णय हैं। दादी को पढ़ने के लिए प्रदर्शन की सहमति नहीं देनी थी।
वर्षा की शाम आँगन में नहीं बैठ सके तो दोनों खिड़की के पास आ गईं। दादी ने अपनी पसंद का पुराना अभ्यास फिर पढ़ा। अवनि ने कहा कि नया भाग भी कर सकती हैं। दादी बोलीं कि आज इसी को आराम से समझना है। अब पाठ की गति कम होने पर किसी को हार जैसा नहीं लगता था। उनकी पढ़ाई का आकार उनकी रुचि से बन रहा था।
कुछ महीने बाद पुस्तक में बहुत सारे पन्ने अभी बाकी थे। दादी ने उसे अधूरा काम कहकर अलग नहीं रखा। वह ऐसी चीज थी जिसमें लौटने का मन होता था। अवनि के लिए भी यह केवल दादी को अक्षर सिखाने की कहानी नहीं रही। उसने सुनना, सुविधा पूछना और दूसरे के लक्ष्य को अपने उत्साह से अलग पहचानना सीखा। सीखने की मेज पर दोनों कुछ नया पा रही थीं।